नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देहव्यापार से जुड़े कानूनों की व्याख्या करते हुए एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई बालिग महिला अपने निजी निवास में अकेले आजीविका के लिए देहव्यापार करती है, तो उस स्थान को कानून की नजर में ‘ब्रोथल’ या ‘कोठा’ नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब तक उस गतिविधि में किसी दलाल, एजेंट, गिरोह या अन्य सेक्स वर्कर की भागीदारी नहीं है, तब तक केवल महिला के अकेले रहने और काम करने के आधार पर पुलिस कार्रवाई उचित नहीं होगी।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन शामिल थे, ने ‘इम्मोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट, 1956’ यानी आईटीपीए की विस्तृत व्याख्या करते हुए यह फैसला दिया। करीब 298 पन्नों के अपने विस्तृत निर्णय में अदालत ने कहा कि इस कानून का उद्देश्य देहव्यापार को पूरी तरह अपराध घोषित करना नहीं है, बल्कि इसके व्यवसायीकरण, मानव तस्करी और संगठित शोषण को रोकना है।
अदालत ने कहा कि कानून की मंशा उन नेटवर्क और गिरोहों पर कार्रवाई करना है, जो महिलाओं और बच्चों का शोषण करते हैं, न कि उन वयस्क महिलाओं को अपराधी मानना जो अपनी इच्छा से यह काम कर रही हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी महिला की गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान के तहत संरक्षित है और राज्य उसकी निजी जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
फैसले में कोर्ट ने आईटीपीए की धारा 7 और 8 का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों, धार्मिक स्थलों, स्कूलों या सड़कों के आसपास खुलेआम ग्राहकों को आकर्षित करना या देहव्यापार का प्रदर्शन करना कानून के दायरे में अपराध माना जा सकता है, क्योंकि इससे सार्वजनिक व्यवस्था और सामाजिक शालीनता प्रभावित होती है। लेकिन निजी दायरे में, बिना किसी सार्वजनिक प्रदर्शन के, स्वेच्छा से किया गया कार्य स्वतः अपराध नहीं बन जाता।
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस और मजिस्ट्रेटों को भी महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए। अदालत ने कहा कि छापेमारी के दौरान वहां मौजूद हर महिला को अपराधी या पीड़ित मान लेना उचित नहीं है। सबसे पहले यह जांच जरूरी है कि संबंधित महिला बालिग है या नहीं और क्या वह अपनी इच्छा से इस पेशे में है। यदि कोई महिला स्वेच्छा से यह कार्य कर रही है, तो उसे जबरन “रेस्क्यू” करके सुधार गृह या शेल्टर होम में रखना उसकी स्वतंत्रता का उल्लंघन माना जाएगा।
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकारें पुनर्वास योजनाएं चला सकती हैं और महिलाओं को वैकल्पिक रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाएं तथा सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध करा सकती हैं, लेकिन किसी बालिग महिला पर उसकी इच्छा के विरुद्ध पुनर्वास थोपना संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ होगा।
इस फैसले को मानवाधिकार और महिला अधिकारों के क्षेत्र में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय सेक्स वर्कर्स की गरिमा, निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर न्यायपालिका के बदलते दृष्टिकोण को दर्शाता है। साथ ही यह फैसला पुलिस कार्रवाई और कानून के दुरुपयोग पर भी महत्वपूर्ण सीमाएं तय करता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद अब भविष्य में देहव्यापार से जुड़े मामलों में पुलिस और प्रशासन को अधिक संवेदनशील और कानूनी संतुलन के साथ कार्रवाई करनी होगी।