21वीं सदी की सबसे शर्मनाक तस्वीर! ओखलकांडा में सड़क न होने से डोली में 4 किमी ढोई गई घायल महिला, फिर पहुंची हल्द्वानी अस्पताल

नैनीताल। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव किस कदर लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ रहा है, इसकी एक मार्मिक तस्वीर नैनीताल जनपद के ओखलकांडा क्षेत्र से सामने आई है। यहां सड़क सुविधा नहीं होने के कारण एक घायल महिला को चार किलोमीटर तक डोली में लादकर मोटर मार्ग तक पहुंचाया गया, जहां से उसे वाहन के माध्यम से हल्द्वानी के अस्पताल भेजा गया। इस घटना का वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं, जिसके बाद लोग सरकार और जनप्रतिनिधियों से सड़क निर्माण की मांग कर रहे हैं।

चार किलोमीटर डोली में ढोकर पहुंचाया सड़क तक

जानकारी के अनुसार ओखलकांडा के दुर्गम क्षेत्र में घायल हुई महिला तक वाहन पहुंचना संभव नहीं था क्योंकि गांव तक सड़क का निर्माण आज तक नहीं हो पाया है। मजबूरन ग्रामीणों ने महिला को डोली में बैठाया और लगभग चार किलोमीटर तक कठिन पहाड़ी रास्तों से पैदल चलकर मुख्य मोटर मार्ग तक पहुंचाया। इसके बाद सड़क पर खड़े वाहन से महिला को उपचार के लिए हल्द्वानी स्थित अस्पताल ले जाया गया।

यह घटना एक बार फिर पहाड़ों में स्वास्थ्य सेवाओं और सड़क संपर्क की वास्तविक स्थिति को उजागर करती है।

सोशल मीडिया पर उठे सवाल

घटना के बाद सोशल मीडिया पर लोगों में भारी आक्रोश देखने को मिला। ऋषभ सिंह रावत ने घायल महिला को डोली में ले जाते हुए तस्वीर और वीडियो साझा करते हुए सरकार से कई सवाल पूछे। लोगों ने संबंधित मंत्री और प्रशासन को टैग करते हुए पूछा कि आखिर राज्य गठन के 26 वर्ष बाद भी पहाड़ों के लोग ऐसी परिस्थितियों में जीवन जीने को क्यों मजबूर हैं।

आयुक्त दीपक रावत ने क्या कहा?

आयुक्त दीपक रावत ने इस मामले में कहा कि गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित स्थानों पर रहने की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि जिन क्षेत्रों में अब तक सड़क नहीं पहुंची है, वहां पैदल मार्गों को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) फेज-4 के अंतर्गत प्रस्तावित किया जा रहा है।

उत्तराखंड बनने के 26 साल बाद भी नहीं बदली तस्वीर

उत्तराखंड राज्य गठन को 26 वर्ष होने जा रहे हैं, लेकिन प्रदेश के कई दूरस्थ गांव आज भी सड़क सुविधा से वंचित हैं। घायल, बीमार, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को अस्पताल पहुंचाने के लिए आज भी डोली और दांडी का सहारा लेना पड़ता है। ऐसे दृश्य समय-समय पर सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों के जरिए सामने आते रहते हैं।

पहले भी सामने आ चुकी हैं ऐसी दर्दनाक तस्वीरें

यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं—

  • नैनीताल के बेलुवाखान तल्ला से बल्दीयाखान मोटर मार्ग तक पहुंचने के लिए दर्जनों गांवों के लोग वर्षों से पैदल रास्ते पर निर्भर हैं।

  • ओखलकांडा के देना गांव के ग्रामीणों को आज भी नजदीकी सड़क तक पहुंचने के लिए लगभग 9 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।

  • महतोली समेत ओखलकांडा ब्लॉक के कई गांव आज भी सड़क संपर्क से कोसों दूर हैं।

  • रामगढ़ क्षेत्र के उमागढ़ मार्ग के भारी बारिश में क्षतिग्रस्त होने के बाद 200 से अधिक ग्रामीण रोजाना पैदल आवाजाही करने को मजबूर हैं। बीमार और बुजुर्ग लोगों को डांडी में बैठाकर उबड़-खाबड़ रास्तों से अस्पताल ले जाया जाता है।

  • भीमताल के मलुवाताल स्थित कसैला तोक में आज भी मरीजों को डोली के सहारे मुख्य सड़क तक पहुंचाया जाता है।

  • बागेश्वर जिले के कपकोट के दुर्गम बीथि गांव में मरीजों को लगभग 5 किलोमीटर तक डोली में उठाकर सड़क तक लाया जाता है।

  • भीमताल और धारी ब्लॉक के बबियाड गांव के लोगों को आज भी मुख्य मार्ग तक पहुंचने के लिए करीब 5 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।

  • नैनीताल से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित सौलिया और तल्ला कुण गांव आज भी लगभग 4 किलोमीटर पक्की सड़क से वंचित हैं, जहां लोगों का परिवहन डोली के सहारे ही होता है।

चारधाम यात्रा पर भी उठ चुके हैं सवाल

उत्तराखंड की दुर्गम परिस्थितियों को लेकर पहले भी गंभीर सवाल उठ चुके हैं। चारधाम यात्रा पर आए महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के.आर. श्रीराम ने यात्रा के दौरान स्वयं खच्चर और उनके परिवार के कुछ सदस्यों ने दांडी के सहारे कठिन, पथरीले और कीचड़युक्त रास्तों से यात्रा की थी। उन्होंने यात्रा व्यवस्थाओं में कई कमियां बताते हुए सुझाव भेजे थे। उनके सुझावों का संज्ञान लेते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया था।

सड़क नहीं, तो विकास अधूरा

ओखलकांडा की यह घटना केवल एक घायल महिला की पीड़ा नहीं, बल्कि उन हजारों पहाड़ी परिवारों की वास्तविकता है जो आज भी सड़क, स्वास्थ्य और आपातकालीन सुविधाओं से वंचित हैं। हर बार ऐसी तस्वीरें सामने आने के बाद सड़क निर्माण के वादे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात अब भी बहुत अधिक नहीं बदले हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते सड़क सुविधा उपलब्ध होती, तो आपातकालीन स्थिति में मरीजों को इस तरह डोली के सहारे अस्पताल नहीं ले जाना पड़ता।

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