उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में इस सीजन में बारिश और बर्फबारी न होने से काश्तकारों की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। खासकर उत्तरकाशी जनपद में सेब उत्पादक किसानों की चिंता गहराती जा रही है। मौसम के बदले मिजाज ने न सिर्फ सेब की संभावित पैदावार पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि मटर, गेहूं और सरसों जैसी रबी फसलों को भी भारी नुकसान की आशंका पैदा हो गई है।
उत्तरकाशी जिले में इस वर्ष अब तक न के बराबर बारिश और बर्फबारी दर्ज की गई है। इसका सीधा असर फसलों की वृद्धि और उत्पादन पर पड़ रहा है। सेब उत्पादकों का कहना है कि बीते वर्ष भी इसी तरह मौसम ने धोखा दिया था, जिसके चलते स्योरी फल पट्टी और धारी कफनौल क्षेत्र में केवल करीब 30 प्रतिशत सेब उत्पादन ही हो सका था। इस बार किसानों को अच्छी फसल की उम्मीद थी, लेकिन जनवरी का आधा महीना बीत जाने के बावजूद न बारिश हुई और न ही बर्फबारी, जिससे एक बार फिर उनकी उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आ रहा है।
रंवाई घाटी के नौगांव, पुरोला और मोरी विकासखंडों में हर साल 25 हजार मीट्रिक टन से अधिक सेब का उत्पादन होता है। इस उत्पादन पर सैकड़ों परिवारों की आजीविका निर्भर है। सेब की अच्छी पैदावार के लिए शीतकालीन अवधि में आवश्यक चिलिंग आवर्स का पूरा होना बेहद जरूरी माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, सेब और अन्य फलों के पेड़ों को वसंत ऋतु में सही तरीके से फूलने और फलने के लिए सर्दियों में 0 से 7 डिग्री सेल्सियस तापमान के बीच लगभग 1200 से 1600 घंटे की ठंड की आवश्यकता होती है, जो सामान्यतः 15 दिसंबर से 15 फरवरी के बीच पूरी होती है।
लेकिन इस बार लगातार शुष्क मौसम के चलते चिलिंग आवर्स की पूर्ति नहीं हो पा रही है। इसका असर सेब के पौधों की शारीरिक प्रक्रियाओं पर पड़ रहा है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
सेब के साथ-साथ रंवाई घाटी में बीते तीन महीनों से बारिश न होने के कारण मटर की फसल भी पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है। काश्तकारों का कहना है कि समय पर नमी न मिलने से न तो पौधों की उचित बढ़वार हो पाई और न ही फलन संभव हो सका। मटर उत्पादक कवींद्र असवाल, रमेश असवाल और नवीन गैरोला ने बताया कि सिंचाई के सीमित साधनों के चलते सूखे खेतों में फसल बचाना संभव नहीं हो पाया, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा है।
स्थिति यहीं तक सीमित नहीं है। जिला पंचायत सदस्य विजय बंधानी के अनुसार, सूखे जैसे हालात के चलते मटर के साथ-साथ गेहूं और सरसों की फसल भी खराब होने की कगार पर पहुंच गई है। दो महीने पहले बोई गई गेहूं और मटर की फसल पूरी तरह अंकुरित नहीं हो पाई है, जबकि असिंचित भूमि पर कई काश्तकार बुवाई तक नहीं कर सके हैं।
वैज्ञानिकों का भी मानना है कि यदि मौसम का यही रुख बना रहा तो आने वाले समय में उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वरिष्ठ वैज्ञानिक (उद्यानिकी) डॉ. पंकज नौटियाल का कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में जब रबी मौसम के दौरान आवश्यक शीत मान तापमान की पूर्ति हो जाती है, तो पौधे समान रूप से सुप्तावस्था से बाहर आते हैं और उनकी शारीरिक क्रियाएं संतुलित रहती हैं, जिससे अच्छी पैदावार की संभावना बनती है। उन्होंने सलाह दी कि यदि संभव हो तो मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए काश्तकारों को हल्की सिंचाई करनी चाहिए।
फिलहाल पहाड़ों में काश्तकार आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। उन्हें उम्मीद है कि फरवरी से पहले यदि बारिश या बर्फबारी हो जाए तो सेब समेत अन्य फसलों को कुछ राहत मिल सकती है, वरना इस साल भी खेती-किसानी पर मौसम की मार भारी पड़ सकती है।