उत्तराखंड में साइबर ठगी का विस्फोट: 5 साल में 468 करोड़ की ठगी, ‘डिजिटल अरेस्ट’ बना नया हथियार

देहरादून उत्तराखंड में साइबर अपराध तेजी से पैर पसार रहा है और इसके आंकड़े अब बेहद चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुके हैं। पिछले पांच वर्षों में प्रदेश के करीब 90 हजार से अधिक लोग साइबर ठगी का शिकार हुए हैं, जबकि ठगों ने कुल मिलाकर 468 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम हड़प ली है। नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में साइबर अपराधों की संख्या में इस अवधि में 12 गुना से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही देशभर में साइबर ठगी को “सरासर लूट” करार दे चुका है। उत्तराखंड के आंकड़े भी इसी खतरे की गंभीरता को दर्शाते हैं। हालांकि सीमित संसाधनों के बावजूद पुलिस और एसटीएफ ने त्वरित कार्रवाई कर लगभग 70 करोड़ रुपये से अधिक की रकम पीड़ितों को वापस दिलाने या ट्रांजेक्शन रोकने में सफलता पाई है।

हर साल बदल रहा है ठगी का तरीका

साइबर ठग लगातार अपने तरीके बदल रहे हैं। पहले जहां केवाईसी अपडेट, लॉटरी और फर्जी कॉल सेंटर के जरिए ठगी होती थी, वहीं अब सबसे खतरनाक ट्रेंड “डिजिटल अरेस्ट” का सामने आया है। इसमें ठग खुद को पुलिस, सीबीआई या अन्य एजेंसी का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल के जरिए पीड़ित को डराते हैं कि वह किसी मनी लॉन्ड्रिंग या आपराधिक मामले में फंस चुका है। इसके बाद गिरफ्तारी से बचाने के नाम पर खाते से रकम ट्रांसफर करवा ली जाती है।

पिछले पांच वर्षों में प्रदेश में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 37 लोगों को शिकार बनाया गया और उनसे करोड़ों रुपये की ठगी की गई। यह तरीका मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर लोगों को डराने पर आधारित है, जिससे पढ़े-लिखे और जागरूक लोग भी जाल में फंस जा रहे हैं।

पांच साल का पूरा रिकॉर्ड

आंकड़ों के अनुसार 2021 में 4492 शिकायतें दर्ज हुईं और लगभग 15 करोड़ रुपये की ठगी हुई। 2022 में शिकायतें बढ़कर 11169 हो गईं और ठगी 40 करोड़ तक पहुंच गई। 2023 में 18020 मामलों में 69 करोड़ रुपये ठगे गए। 2024 में मामलों की संख्या 23801 हो गई और ठगी की रकम 167 करोड़ रुपये पहुंच गई। 2025 में अब तक 31870 शिकायतें सामने आ चुकी हैं और 177.81 करोड़ रुपये की ठगी दर्ज की गई है।

इन वर्षों में पुलिस ने क्रमशः 1.21 करोड़, 2.45 करोड़, 7.41 करोड़, 30.17 करोड़ और 28.59 करोड़ रुपये बचाने में सफलता पाई है।

सबसे ज्यादा ठगी इन तरीकों से

पिछले वर्ष ऑनलाइन ट्रेडिंग के नाम पर सबसे अधिक लोग ठगे गए। इसके बाद डिजिटल अरेस्ट, फेक कॉल/एसएमएस, वर्क फ्रॉम होम, सोशल मीडिया गिफ्ट स्कैम और फर्जी फर्म जैसे तरीके सामने आए। इसके अलावा वेबसाइट हैकिंग, ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग और नौकरी लगवाने के नाम पर भी लोगों को निशाना बनाया गया।

पुलिस का दावा — जागरूकता ही बचाव

एसएसपी एसटीएफ नवनीत भुल्लर के अनुसार, पुलिस लगातार सोशल मीडिया, कॉलर ट्यून, जनजागरूकता अभियानों और साइबर हेल्पलाइन के जरिए लोगों को सतर्क कर रही है। यही वजह है कि पिछले वर्ष 28 करोड़ रुपये से अधिक की रकम समय रहते बचा ली गई। उन्होंने कहा कि भविष्य में साइबर क्राइम से निपटने के लिए संसाधन और तकनीकी क्षमता बढ़ाई जाएगी।

क्या करें लोग

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी अनजान कॉल, लिंक या वीडियो कॉल पर निजी जानकारी, ओटीपी या बैंक डिटेल साझा न करें। पुलिस, सीबीआई या कोई भी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर पैसे ट्रांसफर करने को नहीं कहती। साइबर ठगी होने पर तुरंत 1930 हेल्पलाइन या NCRP पोर्टल पर शिकायत दर्ज करानी चाहिए।

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