चीन सीमा पर मिला करोड़ों साल पुराना शालिग्राम खजाना, वैज्ञानिक बोले- कभी यहां लहराता था टेथिस सागर

चमोली की नीती घाटी के लपथल क्षेत्र में मिले दुर्लभ जीवाश्म, ‘फॉसिल नेशनल पार्क’ बनाने की उठी मांग

गोपेश्वर (चमोली)। उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली की नीती घाटी में चीन सीमा से सटे लपथल क्षेत्र से एक ऐसा भूवैज्ञानिक खजाना सामने आया है, जिसने वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। समुद्र तल से लगभग 4,700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस दुर्गम क्षेत्र में करोड़ों वर्ष पुराने शालिग्राम जीवाश्मों (फॉसिल्स) का विशाल भंडार मिला है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह क्षेत्र कभी प्राचीन टेथिस सागर का हिस्सा था और यहां मिले जीवाश्म उसी समुद्री इतिहास के जीवंत प्रमाण हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि लपथल क्षेत्र में मौजूद शालिग्राम केवल धार्मिक महत्व वाले पत्थर नहीं हैं, बल्कि ये करोड़ों वर्ष पुराने समुद्री जीवों के जीवाश्म हैं, जो हिमालय के निर्माण और पृथ्वी के भूवैज्ञानिक इतिहास की महत्वपूर्ण कहानी बयां करते हैं।

15 से 16 करोड़ वर्ष पुराने हैं जीवाश्म

बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. हुकम सिंह और डॉ. रणवीर सिंह ने जून 2025 में लपथल क्षेत्र का विस्तृत सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण के दौरान उन्हें बड़ी मात्रा में शालिग्राम जीवाश्म मिले।

वैज्ञानिकों के अनुसार यह क्षेत्र लगभग 15 से 16 करोड़ वर्ष पुराने समुद्री अवसादों को अपने भीतर संजोए हुए है। यहां पाए गए जीवाश्म इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि वर्तमान में हिमालय की ऊंचाइयों पर स्थित यह क्षेत्र कभी विशाल टेथिस सागर के तल का हिस्सा हुआ करता था।

डॉ. हुकम सिंह के अनुसार, लपथल क्षेत्र में शालिग्राम के अलावा बेलेमनाइट, गैस्ट्रोपोड और अन्य समुद्री जीवों के जीवाश्म भी मिले हैं, जो इस क्षेत्र की वैज्ञानिक महत्ता को और बढ़ाते हैं।

फॉसिल नेशनल पार्क बनाने की मांग तेज

लपथल क्षेत्र की बढ़ती पहचान के साथ इसे ‘जीवाश्म राष्ट्रीय उद्यान’ घोषित करने की मांग भी जोर पकड़ने लगी है। पिथौरागढ़ वन प्रभाग की वर्ष 2011 से 2021 तक की प्रबंधन योजना में भी इस क्षेत्र को फॉसिल नेशनल पार्क के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया गया था।

पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस क्षेत्र को संरक्षित जीवाश्म उद्यान का दर्जा मिलता है, तो यह न केवल वैज्ञानिक अनुसंधान का प्रमुख केंद्र बनेगा, बल्कि सीमांत क्षेत्र में पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा देगा।

सड़क पहुंची तो खुला रहस्यों का संसार

लंबे समय तक यह क्षेत्र सेना और सीमित प्रशासनिक गतिविधियों तक ही सीमित रहा। लेकिन हाल के वर्षों में सड़क संपर्क स्थापित होने के बाद यहां तक पहुंच अपेक्षाकृत आसान हो गई है। प्रशासन अब स्थानीय लोगों और पर्यटकों को भी निर्धारित अनुमति के साथ यहां जाने की सुविधा दे रहा है।

इसी वर्ष मई माह में यहां नीती अल्ट्रा मैराथन का आयोजन भी किया गया था, जिससे इस क्षेत्र को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली।

‘भारत का ग्रैंड कैन्यन’ भी है आकर्षण का केंद्र

लपथल और रिमखिम के बीच स्थित विशाल चट्टानी घाटियां अपनी अनोखी संरचना के कारण ‘भारत का ग्रैंड कैन्यन’ कहलाती हैं। गहरी और संकरी खाइयों से बनी यह घाटी इतनी विशाल है कि दिन के समय भी कई हिस्सों तक सूर्य की रोशनी नहीं पहुंच पाती।

स्थानीय लोग इसे ‘डरावनी घाटी’ के नाम से जानते हैं। इसी क्षेत्र में स्थित पार्वती कुंड धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखता है।

ट्रेकिंग प्रेमियों के लिए नया आकर्षण

लपथल को ‘कोल्ड डेजर्ट’ यानी ठंडा रेगिस्तान भी कहा जाता है। यह क्षेत्र गढ़वाल, कुमाऊं और चीन सीमा के संगम के निकट स्थित है। यहां पहुंचने के लिए पर्यटकों को सुमना (चमोली) या मुनस्यारी (पिथौरागढ़) से कई दिनों तक कठिन ट्रेकिंग करनी पड़ती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि उचित संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन के साथ यह क्षेत्र भविष्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर का भू-पर्यटन केंद्र बन सकता है।

धार्मिक आस्था से भी जुड़ा है शालिग्राम

सनातन धर्म में शालिग्राम शिला को भगवान विष्णु का साक्षात स्वरूप माना जाता है। नेपाल की गंडकी नदी क्षेत्र में शालिग्राम सबसे अधिक पाए जाते हैं, लेकिन चमोली के लपथल क्षेत्र में इतनी बड़ी मात्रा में इनका मिलना बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

धार्मिक आस्था और वैज्ञानिक महत्व का यह अद्भुत संगम नीती घाटी को देश के सबसे विशिष्ट क्षेत्रों में शामिल करता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इस धरोहर का संरक्षण किया गया, तो यह न केवल हिमालय के भूवैज्ञानिक इतिहास को समझने में मदद करेगी, बल्कि उत्तराखंड को वैश्विक भू-पर्यटन मानचित्र पर भी नई पहचान दिलाएगी।

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