दूनघाटी में पीजी का ‘काला’ कारोबार! किराये की आड़ में कितनी बड़ी है लापरवाही की दुनिया?

बिना लाइसेंस और सुरक्षा मानकों की अनदेखी के आरोपों ने खड़े किए सवाल, छात्र-छात्राओं से मोटी रकम वसूलने वाले संचालकों पर निगरानी कितनी?

पुलिस चेकिंग में सत्यापन और सीसीटीवी के निर्देश, लेकिन फायर सेफ्टी से लेकर भवन क्षमता तक कई सवाल बरकरार

देहरादून। राजधानी देहरादून में पढ़ाई और रोजगार के लिए हर साल बड़ी संख्या में युवा पहुंचते हैं। इन युवाओं के लिए रहने की सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है सुरक्षित और सुविधाजनक आवास। इसी जरूरत ने पिछले कुछ वर्षों में शहर में पीजी यानी पेइंग गेस्ट आवास के कारोबार को तेजी से बढ़ाया है। शिक्षण संस्थानों, कोचिंग सेंटरों और रोजगार केंद्रों के आसपास बड़ी संख्या में मकानों और व्यावसायिक भवनों को पीजी में तब्दील कर दिया गया है।

पीजी कारोबार ने जहां हजारों युवाओं को रहने की सुविधा उपलब्ध कराई है, वहीं इसके तेजी से विस्तार के साथ अब इसकी वैधता, सुरक्षा और संचालकों की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल भी उठने लगे हैं। आरोप हैं कि कई जगह बिना जरूरी लाइसेंस और मानकों का पालन किए पीजी संचालित किए जा रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि राजधानी में चल रहे पीजी में आखिर कितने वास्तव में नियमों के अनुरूप हैं और कितने केवल किराये से कमाई का जरिया बन चुके हैं?

मामला सिर्फ किराये और उपलब्ध सुविधाओं तक सीमित नहीं है। जिस भवन में एक साथ दर्जनों युवक-युवतियां रह रहे हों, वहां अग्निसुरक्षा, भवन की क्षमता, विद्युत सुरक्षा, आपातकालीन निकास, पुलिस सत्यापन, सीसीटीवी और किरायेदारों का रिकॉर्ड जैसे मानक बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इनमें किसी भी स्तर पर लापरवाही की स्थिति में एक छोटी घटना भी बड़े हादसे में बदल सकती है।

पीजी कारोबार में घूम रही बड़ी रकम, लेकिन सुरक्षा कितनी?

देहरादून में पीजी की मांग लगातार बनी हुई है। राजधानी के प्रमुख शिक्षण संस्थानों और रोजगार केंद्रों के आसपास रहने के लिए युवाओं की संख्या बढ़ने के साथ संचालकों को भी इसका सीधा फायदा मिल रहा है। एक ही भवन में कई कमरे तैयार कर उन्हें अलग-अलग छात्रों और कामकाजी युवाओं को किराये पर देकर संचालक नियमित आय अर्जित कर रहे हैं।

पीजी कारोबार में बड़ी रकम घूम रही है, लेकिन इसके समानांतर यह सवाल भी खड़ा है कि क्या हर संचालक जरूरी अनुमति और सुरक्षा मानकों का पालन कर रहा है?

किसी मकान को पीजी में बदलने के बाद उसमें रहने वालों की संख्या सामान्य आवासीय उपयोग की तुलना में काफी बढ़ सकती है। ऐसे में भवन की क्षमता, बिजली की व्यवस्था, सीढ़ियों और निकासी मार्ग की स्थिति तथा आग लगने की स्थिति में बाहर निकलने के विकल्पों की अहमियत और बढ़ जाती है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस पीजी में एक साथ बड़ी संख्या में लोग रह रहे हैं, उसकी सुरक्षा जांच आखिरी बार कब हुई?

अग्निसुरक्षा पर उठे सवाल

हालिया रिपोर्टों में देहरादून के कई पीजी में अग्निसुरक्षा से जुड़े नियमों की अनदेखी की शिकायतें सामने आई हैं। इनमें पर्याप्त निकासी व्यवस्था, अग्निशमन उपकरण और अन्य सुरक्षा उपायों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

पीजी में रहने वाले छात्र-छात्राओं की सुरक्षा केवल पुलिस सत्यापन से सुनिश्चित नहीं हो सकती। यदि किसी भवन में आग लग जाए, गैस रिसाव हो जाए, शॉर्ट सर्किट हो या भवन से जुड़ी कोई दुर्घटना हो जाए तो वहां मौजूद लोगों के लिए सुरक्षित बाहर निकलने की व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।

दर्जनों लोगों के रहने वाले भवन में यदि आपातकालीन निकास पर्याप्त नहीं हैं या अग्निशमन उपकरण काम करने की स्थिति में नहीं हैं, तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है।

सेलाकुई छात्रावास की आग ने बढ़ाई चिंता

पीजी और छात्रावासों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चिंता उस समय और बढ़ गई, जब हाल ही में सेलाकुई के एक निजी छात्रावास में आग की घटना सामने आई।

घटना के बाद अग्निशमन विभाग की जांच में अनिवार्य अग्निशमन अनापत्ति प्रमाणपत्र नहीं होने तथा स्मोक डिटेक्टर और स्प्रिंकलर जैसी व्यवस्थाओं के अभाव की बात सामने आई थी।

यह घटना केवल एक निजी छात्रावास तक सीमित सवाल नहीं छोड़ती, बल्कि राजधानी देहरादून और आसपास के क्षेत्रों में संचालित छात्रावासों तथा पीजी की सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक जांच की जरूरत को भी सामने लाती है।

अगर किसी भवन में बड़ी संख्या में छात्र रहते हैं तो आग लगने की स्थिति में कुछ मिनट भी बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। ऐसे में फायर सेफ्टी को केवल कागजी औपचारिकता मानना गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।

पुलिस की चेकिंग में सत्यापन और सीसीटीवी पर जोर

सरकार और प्रशासन का रुख लगातार यह रहा है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले आवासीय और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

इसी क्रम में देहरादून पुलिस ने अगस्त में प्रेमनगर क्षेत्र के पीजी और हॉस्टलों में चेकिंग अभियान चलाया। चेकिंग के दौरान संचालकों को रहने वालों का शत-प्रतिशत पुलिस सत्यापन कराने और सीसीटीवी लगाने के निर्देश दिए गए।

बाहरी लोगों के प्रवेश तथा अन्य गतिविधियों पर भी निगरानी बढ़ाने को कहा गया। पुलिस सत्यापन और सीसीटीवी निश्चित तौर पर सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन पीजी व्यवस्था की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केवल इन्हीं दो व्यवस्थाओं को पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

क्योंकि अपराध और बाहरी लोगों की निगरानी के साथ-साथ भवन की संरचनात्मक और अग्निसुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

होमस्टे पर कार्रवाई हुई तो पीजी पर सवाल क्यों नहीं?

प्रशासन इससे पहले दूसरे तरह के आवासीय व्यवसायों में भी कार्रवाई कर चुका है। मई 2026 में मानकों के विपरीत संचालित 96 होमस्टे के पंजीकरण निरस्त किए गए थे। निरीक्षण के दौरान कई जगह अग्निशमन उपकरणों की कमी जैसी खामियां भी मिली थीं।

इस कार्रवाई से सरकार और प्रशासन का संदेश स्पष्ट है कि निर्धारित मानकों से खिलवाड़ स्वीकार नहीं किया जाएगा।

लेकिन अब इसी आधार पर पीजी व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि होमस्टे के मामले में निरीक्षण, खामियों की पहचान और पंजीकरण निरस्तीकरण जैसी कार्रवाई हो सकती है, तो राजधानी के पीजी नेटवर्क की भी संयुक्त और व्यापक सुरक्षा जांच क्यों न की जाए?

प्रशासन को सार्वजनिक करनी होगी पीजी की वास्तविक तस्वीर

राजधानी में कितने पीजी संचालित हैं, यह सवाल अब महत्वपूर्ण हो गया है। प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि देहरादून में कुल कितने पीजी चल रहे हैं और इनमें से कितने पंजीकृत हैं।

इसके साथ यह भी सामने आना चाहिए कि:

  • कितने पीजी के पास जरूरी अनुमति है?
  • कितने पीजी के पास अग्निसुरक्षा संबंधी स्वीकृति है?
  • कितने भवन अपनी स्वीकृत क्षमता के अनुरूप छात्रों को आवास दे रहे हैं?
  • कितने पीजी में रहने वाले लोगों का पुलिस सत्यापन हुआ है?
  • कितने पीजी में सीसीटीवी की व्यवस्था है?
  • कितने भवनों में पर्याप्त आपातकालीन निकास उपलब्ध है?
  • कितने पीजी में अग्निशमन उपकरण मौजूद हैं और वे कार्यशील स्थिति में हैं?
  • विद्युत व्यवस्था की जांच कितने समय से नहीं हुई है?

इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही राजधानी के पीजी कारोबार की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

सिर्फ पुलिस सत्यापन से नहीं होगा समाधान

पीजी में रहने वाले युवाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केवल पुलिस सत्यापन और सीसीटीवी को आधार बनाना पर्याप्त नहीं होगा।

एक व्यापक जांच में भवन सुरक्षा, अग्निसुरक्षा, स्वच्छता, विद्युत व्यवस्था, आपातकालीन निकास और किरायेदारों के रिकॉर्ड की एक साथ जांच जरूरी है।

साथ ही भवन की वास्तविक क्षमता और उसमें रहने वाले लोगों की संख्या का भी मिलान किया जाना चाहिए। यदि किसी भवन की क्षमता सीमित है, लेकिन उसमें उससे कई गुना अधिक लोगों को रखा जा रहा है तो यह स्थिति अपने आप में सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है।

पीजी अब सिर्फ मकान किराये पर देने का मामला नहीं

राजधानी में पीजी कारोबार अब महज मकान का एक हिस्सा किराये पर देने का मामला नहीं रह गया है। यह सीधे तौर पर हजारों विद्यार्थियों और कामकाजी युवाओं की सुरक्षा से जुड़ा विषय बन चुका है।

युवाओं और उनके परिवारों के लिए पीजी सिर्फ एक कमरा नहीं, बल्कि कई महीनों या वर्षों तक रहने का स्थान होता है। ऐसे में वे संचालक पर भरोसा करते हैं कि उन्हें सुरक्षित वातावरण मिलेगा।

इसलिए प्रशासन को पीजी संचालकों की सूची तैयार करने और उसे सार्वजनिक करने के साथ-साथ नियमित निरीक्षण की व्यवस्था भी विकसित करनी चाहिए। नियमों का उल्लंघन मिलने पर नोटिस, जुर्माने से लेकर गंभीर मामलों में सीलिंग तक की स्पष्ट कार्रवाई का तंत्र होना चाहिए।

मोटी कमाई के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी

पीजी कारोबार में संचालकों को नियमित आय मिलती है। छात्र-छात्राएं और कामकाजी युवा किराये के रूप में हर महीने बड़ी रकम खर्च करते हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि इस कमाई के बदले उन्हें किस स्तर की सुरक्षा और सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।

यदि किसी पीजी में रहने वालों की संख्या लगातार बढ़ाई जा रही है, लेकिन उसी अनुपात में सुरक्षा इंतजाम नहीं बढ़ाए जा रहे, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।

व्यवसाय करना गलत नहीं है, लेकिन जब व्यवसाय सीधे लोगों के आवास और सुरक्षा से जुड़ा हो तो नियमों का पालन और संचालक की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी हो जाती है।

हाईकोर्ट का आदेश भी अग्निसुरक्षा की गंभीरता बताता है

अग्निसुरक्षा को लेकर उत्तराखंड हाईकोर्ट का जुलाई 2026 का एक आदेश भी महत्वपूर्ण है। देहरादून से जुड़े एक मामले में हाईकोर्ट ने अग्निसुरक्षा कमियों के बावजूद फायर एनओसी जारी करने संबंधी जिलाधिकारी के आदेश को निरस्त किया था।

इस मामले से यह स्पष्ट होता है कि अग्निसुरक्षा प्रमाणन केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके लिए निर्धारित नियमों और सुरक्षा मानकों का वास्तविक पालन जरूरी है।

ऐसे में राजधानी में बड़ी संख्या में युवाओं के रहने वाले पीजी और छात्रावासों को लेकर अग्निसुरक्षा के मानकों की गंभीरता और बढ़ जाती है।

सरकार के सामने बड़ी चुनौती

देहरादून शिक्षा और रोजगार का बड़ा केंद्र है। यहां हर साल बड़ी संख्या में युवा दूसरे शहरों और राज्यों से आते हैं। उनके लिए पीजी आवास की जरूरत आने वाले समय में भी बनी रहने वाली है। इसलिए पीजी कारोबार को खत्म करना समाधान नहीं है, बल्कि इसे नियमबद्ध, पारदर्शी और सुरक्षित बनाना जरूरी है।

प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि राजधानी में पीजी कारोबार भी चलता रहे और युवाओं की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो। इसके लिए पीजी की संख्या, पंजीकरण, भवन क्षमता, अग्निसुरक्षा, पुलिस सत्यापन और अन्य मानकों की स्पष्ट जानकारी सामने लानी होगी।

नियमित निरीक्षण के साथ गंभीर खामियां मिलने पर प्रभावी कार्रवाई भी जरूरी है, ताकि संचालकों में नियमों के पालन को लेकर गंभीरता बनी रहे।

असली सवाल सुरक्षा का

देहरादून में पीजी कारोबार का विस्तार शहर की बदलती जरूरतों का परिणाम है। हजारों युवाओं के लिए यह जरूरी आवासीय व्यवस्था बन चुका है। लेकिन इस कारोबार की आड़ में यदि कहीं सुरक्षा मानकों की अनदेखी हो रही है तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पीजी से कितना पैसा कमाया जा रहा है। असली सवाल यह है कि उस पैसे के बदले वहां रहने वाले छात्र-छात्राओं और कामकाजी युवाओं को कितनी सुरक्षा दी जा रही है।

प्रशासन को अब इस पूरे नेटवर्क की वास्तविक स्थिति सामने लानी होगी। कितने पीजी वैध हैं, कितने मानकों पर खरे उतरते हैं और कितने केवल किराये की कमाई के लिए नियमों की अनदेखी कर रहे हैं—इन सवालों का जवाब जरूरी है।

राजधानी में पीजी कारोबार चले, युवाओं को रहने की सुविधा मिले और संचालकों को रोजगार व आय का अवसर मिले, लेकिन यह सब सुरक्षा और नियमों की कीमत पर नहीं होना चाहिए। यही इस पूरे मामले की सबसे बड़ी चुनौती है।

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