रुपये में रिकॉर्ड गिरावट, डॉलर के मुकाबले पहली बार सबसे निचले स्तर पर.: अमेरिकी टैरिफ से भारतीय अर्थव्यवस्था को दोहरा झटका

Uttarakhand First News  नई दिल्ली | 30 अगस्त 2025

भारतीय अर्थव्यवस्था को उस वक्त गहरा झटका लगा जब भारतीय रुपया शुक्रवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले फिसलकर 88.29 के अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। यह गिरावट ना केवल अर्थव्यवस्था की स्थिरता पर सवाल खड़े करती है, बल्कि वैश्विक व्यापार संबंधों में बढ़ते तनाव का भी संकेत देती है।

हालांकि दिन के दूसरे हिस्से में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के हस्तक्षेप के चलते मामूली सुधार देखने को मिला और रुपया 2:10 बजे तक 88.12 पर ट्रेड करता नजर आया, लेकिन इससे बाजार की घबराहट कम नहीं हुई है।

🇺🇸 अमेरिका की नीति से भारत पर असर: 25% टैरिफ से गहराया संकट

रुपये की इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए अतिरिक्त 25% टैरिफ को माना जा रहा है। यह टैरिफ भारत द्वारा रूस से सस्ते तेल की खरीद के जवाब में लगाया गया है। इसके बाद अब भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर कुल शुल्क 50% तक पहुंच चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत का निर्यात बाजार, खासकर अमेरिका में, बुरी तरह प्रभावित होगा और रुपये पर निरंतर दबाव बना रहेगा।

2025 में एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा बना रुपया

साल 2025 की शुरुआत से अब तक भारतीय रुपया करीब 3% कमजोर हो चुका है। यह गिरावट रुपये को एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी बना चुकी है। शुक्रवार को रुपया न केवल डॉलर, बल्कि चीनी युआन के मुकाबले भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर देखा गया।

विदेशी मुद्रा बाजार के विश्लेषकों का कहना है कि जैसे ही रुपया 87.60 के स्तर से नीचे गया, बाजार में बड़ी मात्रा में डॉलर खरीदारी शुरू हो गई, जिससे स्टॉप-लॉस ऑर्डर ट्रिगर हो गए और गिरावट और तेज हो गई। अब बाजार की नजर 89 रुपये प्रति डॉलर के अगले संभावित स्तर पर है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी

अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि यदि अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ दीर्घकालिक रूप से लागू रहते हैं, तो इससे भारत की विकास दर में 60 से 80 बेसिस पॉइंट्स तक की गिरावट आ सकती है।

यह संकट ऐसे समय में सामने आया है जब RBI ने चालू वित्त वर्ष (FY26) के लिए 6.5% विकास दर का अनुमान जताया था। लेकिन अब रुपये की कमजोरी और निर्यात में संभावित गिरावट, इस लक्ष्य को चुनौती देती दिख रही है।

निर्यात, उद्योग और रोजगार पर भारी असर

अमेरिका भारत का प्रमुख निर्यात भागीदार है और भारत की GDP में 2.2% हिस्सेदारी इसी द्विपक्षीय व्यापार से आती है। नई टैरिफ नीति का सीधा असर भारत के कपड़ा, ज्वेलरी, और श्रम-प्रधान उद्योगों पर होगा, जो पहले ही लागत बढ़ने और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा से जूझ रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन क्षेत्रों में रोजगार छटनी का खतरा वास्तविक बन चुका है, जिससे ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के जीवन पर सीधा प्रभाव पड़ेगा।

निवेशकों का भरोसा हिला: 9.7 अरब डॉलर की निकासी

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) का रुख भी भारत से हटता नजर आ रहा है। इस वर्ष अब तक उन्होंने भारतीय शेयर और बॉन्ड बाजार से लगभग 9.7 अरब डॉलर की पूंजी निकाल ली है। यह भारतीय बाजारों में भरोसे की कमी और अनिश्चितता को दर्शाता है।

इस निकासी से रुपये पर अतिरिक्त दबाव बना है, जिससे आगे और गिरावट की आशंका जताई जा रही है।

 क्या आने वाला समय और मुश्किल होगा?

भारत के सामने अमेरिका के साथ व्यापार संतुलन बनाए रखने, रुपये की स्थिरता बचाने, और निर्यात उद्योग को सहारा देने जैसी कई चुनौतियाँ हैं। यदि यह गिरावट का सिलसिला जारी रहा, तो इसका असर केवल आम आदमी की जेब तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की आर्थिक रणनीति को भी पूरी तरह से पुनःनिर्धारित करना पड़ेगा।

सरकार और RBI को अब बेहद सोच-समझकर कदम उठाने होंगे, ताकि मुद्रा बाज़ार में विश्वास कायम रहे और अर्थव्यवस्था स्थिर रह सके।

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