हौसलों की मिसाल बनी नंदा: पिता की बीमारी और कर्ज के बीच बेटी ने संभाला लोडर का स्टेयरिंग, परिवार को दी नई दिशा

हरिद्वार। जब परिस्थितियां कठिन हो जाएं तो अक्सर लोग हार मान लेते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो संघर्ष को ही अपनी ताकत बना लेते हैं। हरिद्वार जिले के सराय क्षेत्र की रहने वाली नंदा यादव ऐसी ही एक प्रेरणादायक बेटी हैं, जिन्होंने परिवार पर आए आर्थिक संकट के बीच न केवल जिम्मेदारियां संभालीं, बल्कि अपने साहस और मेहनत से पूरे परिवार का सहारा बन गईं।

संकट ने बदली जिंदगी की दिशा

नंदा के पिता राजेश यादव और माता आरती यादव ने वर्षों तक उद्योगों में नौकरी कर अपने बच्चों का पालन-पोषण किया। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर बनाने के लिए राजेश ने नौकरी छोड़कर लोडर वाहन खरीदकर परिवहन व्यवसाय शुरू किया। लेकिन किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया।

एक के बाद एक दो वाहन दुर्घटनाओं में क्षतिग्रस्त हो गए। इसके बावजूद राजेश ने हार नहीं मानी और कर्ज लेकर तीसरा लोडर खरीदा। लेकिन वर्ष 2024 में यह वाहन भी हरिद्वार के चंडी चौक के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गया। हादसे के समय चालक के नशे में होने की बात सामने आई। इस दुर्घटना से परिवार पर आर्थिक संकट और गहरा गया, जबकि राजेश की तबीयत भी लगातार खराब रहने लगी।

बेटी ने संभाली जिम्मेदारी

पिता की बिगड़ती सेहत और बढ़ते कर्ज को देखकर नंदा ने एक बड़ा फैसला लिया। दसवीं तक पढ़ाई करने वाली नंदा ने अपनी पढ़ाई बीच में रोककर लोडर का स्टेयरिंग संभाल लिया। जिस उम्र में अधिकांश युवा अपने भविष्य की योजनाएं बना रहे होते हैं, उस उम्र में नंदा ने परिवार के भविष्य की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली।

आज वह उत्तराखंड के विभिन्न जिलों के साथ-साथ हरियाणा तक माल ढुलाई का कार्य करती हैं। ऋषिकेश, देहरादून, चंपावत, पिथौरागढ़ और अन्य क्षेत्रों में वह नियमित रूप से वाहन चलाकर परिवार की आजीविका चला रही हैं।

मां बनीं बेटी की ताकत

नंदा के इस संघर्ष में उनकी मां आरती यादव हर कदम पर उनके साथ हैं। जब भी नंदा माल लेकर किसी यात्रा पर निकलती हैं, उनकी मां क्लीनर की सीट पर बैठकर उनके साथ रहती हैं।

आरती केवल क्लीनर की भूमिका नहीं निभातीं, बल्कि बेटी की सुरक्षा और हौसले की भी सबसे बड़ी ताकत हैं। उनका कहना है कि समाज में हर तरह के लोग होते हैं, लेकिन यदि बेटियों को अवसर और भरोसा मिले तो वे किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल कर सकती हैं।

चुका रही हैं वाहन और मकान की किस्त

नंदा केवल रोजमर्रा के खर्च ही नहीं उठा रहीं, बल्कि वाहन और मकान की किस्तों का भुगतान भी कर रही हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति को संभालते हुए वह अपने बीमार पिता के इलाज और घर के अन्य खर्चों का भी ध्यान रख रही हैं।

उनका भाई जितेंद्र गांव में रहकर घर-परिवार की जिम्मेदारियां निभा रहा है, जबकि नंदा सड़क पर संघर्ष कर परिवार की गाड़ी आगे बढ़ा रही हैं।

पढ़ाई और बेहतर भविष्य का सपना

हालांकि परिस्थितियों ने नंदा को समय से पहले जिम्मेदार बना दिया, लेकिन उन्होंने अपने सपनों को छोड़ा नहीं है। उनका सपना इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी करने के बाद कंप्यूटर क्षेत्र में बेहतर प्रशिक्षण प्राप्त करना और अपने लिए नया भविष्य तैयार करना है।

नंदा का मानना है कि आज के समय में कौशल और कला ही सबसे बड़ी पूंजी है। व्यक्ति जितना अधिक सीखता है, उसके लिए अवसरों के उतने ही नए रास्ते खुलते हैं।

बेटियों के लिए प्रेरणा

नंदा यादव की कहानी केवल संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि यह साहस, जिम्मेदारी और आत्मविश्वास की मिसाल भी है। उन्होंने साबित किया है कि बेटियां केवल परिवार का मान ही नहीं बढ़ातीं, बल्कि कठिन समय में पूरे परिवार की सबसे मजबूत आधारशिला भी बन सकती हैं।

आज नंदा उन हजारों बेटियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं, जो अपने सपनों और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ने का साहस रखती हैं। उनके हौसले और मेहनत ने यह संदेश दिया है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, दृढ़ संकल्प के साथ हर चुनौती को अवसर में बदला जा सकता है।

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