पत्नी की आत्महत्या मामले में पति को बड़ी राहत, हाईकोर्ट ने रद्द की 7 साल की सजा; कहा– मजबूत संदेह भी सबूत नहीं होता

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बड़ी राहत देते हुए सत्र न्यायालय का फैसला रद्द कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि संदेह कभी भी ठोस साक्ष्य का स्थान नहीं ले सकता।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ में हुई। यह आपराधिक अपील वर्ष 2011 से न्यायालय में लंबित थी, जिसमें अपीलकर्ता ने ऊधम सिंह नगर की सत्र अदालत के 30 अगस्त 2011 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत सात वर्ष के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।

2004 में हुई थी आत्महत्या

मामले के अनुसार 15 सितंबर 2004 को खटीमा क्षेत्र स्थित वैवाहिक घर में अपीलकर्ता की पत्नी ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हत्या की पुष्टि नहीं हुई। ट्रायल कोर्ट ने दहेज हत्या और दहेज उत्पीड़न के आरोपों से आरोपी को बरी कर दिया था, लेकिन पत्नी के चरित्र पर संदेह और कथित मानसिक प्रताड़ना को आधार बनाते हुए आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराया था।

साक्ष्यों में नहीं मिला प्रत्यक्ष उकसावे का प्रमाण

उच्च न्यायालय ने पूरे मामले के साक्ष्यों का पुनः परीक्षण किया और पाया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान सामान्य प्रकृति के थे। आत्महत्या से ठीक पहले किसी प्रत्यक्ष उकसावे, विशेष घटना या ऐसे कृत्य का कोई ठोस प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाया।

अदालत ने यह भी माना कि न तो कोई सुसाइड नोट मिला और न ही ऐसा कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य सामने आया, जिससे धारा 306 के तहत अपराध सिद्ध किया जा सके।

वैवाहिक विवाद को नहीं माना जा सकता उकसावा अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई थी कि वैवाहिक जीवन में मतभेद या चरित्र पर संदेह मात्र को आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं माना जा सकता। उच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि दोषसिद्धि के लिए प्रत्यक्ष और ठोस साक्ष्य होना आवश्यक है।

सत्र न्यायालय का फैसला रद्द

इन सभी तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय का फैसला निरस्त कर दिया और अपीलकर्ता को भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के आरोप से बरी कर दिया।

महत्वपूर्ण टिप्पणी फैसले में न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि: “संदेह चाहे कितना भी प्रबल क्यों न हो, वह प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।” इस निर्णय को आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े मामलों में साक्ष्यों की आवश्यकता और न्यायिक मानकों के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *