कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए HC ने चार्जशीट और मुकदमा किया निरस्त
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पर्यावरण और गंगा संरक्षण अभियान से जुड़ी दो साध्वियों और दो शोधार्थियों को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की एकल पीठ ने श्रीनगर (गढ़वाल) की निचली अदालत में लंबित मुकदमे, चार्जशीट और संज्ञान आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि यह मामला कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं को केवल इसलिए आरोपी बनाया गया, क्योंकि वे दूसरे पक्ष के खिलाफ दर्ज मामले में गवाह थे और यह कार्रवाई प्रतिशोध की भावना से प्रेरित प्रतीत होती है।
2013 की घटना से जुड़ा है पूरा विवाद
मामला 13 मई 2013 का है। अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्मचारिणी समर्पिता और अन्य याचिकाकर्ता धारी देवी मंदिर में पूजा कर रहे थे। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि इस दौरान कुछ असामाजिक तत्व मंदिर में घुस आए और वहां हंगामा किया। इस संबंध में हेमंत ध्यानी द्वारा प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।
इसके जवाब में दूसरे पक्ष के रविन्द्र सिलवाल ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ धारा 147, 504 और 506 आईपीसी के तहत काउंटर एफआईआर दर्ज करवाई। हाईकोर्ट ने इस काउंटर एफआईआर को प्रतिशोधात्मक कार्रवाई करार दिया।
पुलिस जांच को कोर्ट ने बताया दोषपूर्ण
सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि पुलिस ने इस मामले की जांच में गंभीर लापरवाही बरती।
महत्वपूर्ण गवाहों के बयान दर्ज नहीं किए गए
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को कानून के अनुसार संकलित नहीं किया गया
उसी घटना से जुड़े एक अन्य मामले में निचली अदालत पहले ही आरोपियों को बरी कर चुकी थी
कोर्ट ने माना कि दोषपूर्ण जांच के कारण ही मामला न्यायिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
अपराध का कोई ठोस आधार नहीं
न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय ने आदेश में कहा कि एफआईआर और संज्ञान आदेश को पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ बलवा या धमकी देने का कोई ठोस अपराध नहीं बनता। जब उसी घटना में मुख्य आरोपी पहले ही बरी हो चुके हैं, तो याचिकाकर्ताओं को मुकदमे का सामना करने के लिए बाध्य करना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
याचिकाकर्ताओं की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ताओं में—
ब्रह्मचारिणी समर्पिता और कुसुम महाजन साध्वी हैं, जो गंगा किनारे आश्रम में निवास करती हैं।
दीपक कुमार कोठारी और अम्बा शंकर बाजपेयी दिल्ली में शोधार्थी हैं।
उनके अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि सभी याचिकाकर्ता शांतिप्रिय नागरिक हैं और लंबे समय से पर्यावरण एवं गंगा संरक्षण के लिए कार्य कर रहे हैं।
HC का स्पष्ट संदेश
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के तर्कों को स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ जारी सम्मन, चार्जशीट और पूरी न्यायिक कार्यवाही को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया। इस फैसले के जरिए कोर्ट ने साफ संदेश दिया कि कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल किसी को परेशान करने या दबाव बनाने के लिए नहीं किया जा सकता।