“प्यार की सज़ा जेल क्यों? नाबालिग डेटिंग और पॉक्सो एक्ट पर हाईकोर्ट ने उठाए सवाल”

नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय में उस जनहित याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें नाबालिग लड़के-लड़कियों के आपसी प्रेम संबंधों और डेटिंग के मामलों में लड़कों को ही अपराधी मानकर पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत जेल भेजने की प्रथा को चुनौती दी गई है। कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य और केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और अगली सुनवाई अगले हफ्ते के लिए तय की है।

हल्द्वानी जेल में 20 बच्चे बंद

सुनवाई के दौरान अदालत के संज्ञान में यह भी आया कि वर्तमान समय में हल्द्वानी जेल में ऐसे ही मामलों में गिरफ्तार 20 नाबालिग लड़के बंद हैं। इनमें से कई को उस उम्र में जेल जाना पड़ा, जब वे स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई कर रहे होते।

याचिका में उठाए गए मुद्दे

यह जनहित याचिका अधिवक्ता मनीषा भंडारी द्वारा दायर की गई। उनका कहना है कि नाबालिगों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों में भी हमेशा लड़के को ही दोषी ठहराया जाता है।

  • कई मामलों में लड़की उम्र में बड़ी होती है, फिर भी लड़के को अपराधी मान लिया जाता है।

  • पॉक्सो एक्ट की कुछ धाराएं सीधे गिरफ्तारी और जेल की ओर ले जाती हैं, जबकि ऐसी स्थिति में काउंसिलिंग की ज़रूरत है।

  • अधिवक्ता का कहना है कि यह नाबालिगों के भविष्य को बर्बाद कर रहा है, क्योंकि जिस उम्र में उन्हें शिक्षा और मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, वे जेल की सलाखों के पीछे होते हैं।

काउंसिलिंग बनाम जेल

भंडारी ने कोर्ट में दलील दी कि भारतीय दंड संहिता और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के अनुसार 16 से 18 वर्ष की उम्र के नाबालिग अपराधियों को दंड देने की बजाय उनकी मानसिक स्थिति समझने और सुधारने के लिए बोर्ड गठित करने का प्रावधान है।
इसके बावजूद पॉक्सो एक्ट के तहत सीधे जेल भेज देना सोचनीय है और यह कानून की भावना के अनुरूप नहीं है।

कोर्ट की टिप्पणी और अगली सुनवाई

मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने याचिका पर सुनवाई की। हालांकि तकनीकी कारणों से आज विस्तृत सुनवाई संभव नहीं हो सकी। कोर्ट ने अगली सुनवाई अगले हफ्ते के लिए निर्धारित की है और इस दौरान केंद्र व राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने को कहा है।

बड़ा सवाल: प्रेम या अपराध?

यह मामला सिर्फ कानूनी पहलू ही नहीं बल्कि सामाजिक सोच से भी जुड़ा है। सवाल यह है कि नाबालिग लड़के-लड़कियों के बीच बने आपसी रिश्तों को क्या हमेशा अपराध की दृष्टि से देखा जाना चाहिए, या फिर उन्हें सही दिशा देने के लिए काउंसिलिंग और परामर्श का रास्ता अपनाना चाहिए?

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