देहरादून: पहाड़ों पर बरप रही मानसूनी आपदा ने हजारों लोगों की जिंदगी तहस-नहस कर दी है। अब सवाल सिर्फ राहत सामग्री का नहीं, बल्कि जीवित रहने और भविष्य संवारने का है। बागेश्वर, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और चमोली जैसे जिलों में हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि प्रभावित गांवों के लोग अब पुनर्वास और स्थायी विस्थापन की मांग करने लगे हैं।
केंद्रीय टीम ने लिया जायजा, गांववालों ने रखी मांग
मंगलवार को आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने आई केंद्रीय टीम ने बागेश्वर जिले के उन गांवों का निरीक्षण किया, जिनका इस आपदा में सब कुछ तबाह हो गया। वहां लोगों ने साफ कहा कि अब इन हालातों में रहना असंभव है। उनका दर्द यही है – “हमें यहां से सुरक्षित स्थानों पर बसाया जाए।”
दहशत और टूटे संपर्क – गांवों में जिंदगी ठप
रुद्रप्रयाग जिले के वासु केदार क्षेत्र के ताल जामण गांव में पहाड़ से लगातार पत्थरों की बरसात हो रही है। लोग खौफ के साए में जी रहे हैं। गंगोत्री और यमुनोत्री धाम – जहां हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते थे – इस बार सुनसान पड़े हैं।
5 अगस्त से गंगोत्री धाम पूरी तरह ठप है।
15–16 अगस्त से यमुनोत्री धाम में एक भी यात्री नहीं पहुंच पाया।
हाइवे पूरी तरह बाधित हैं और 100 से अधिक गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय से टूटा हुआ है। नतीजतन, जरूरी सामान की सप्लाई रुक गई है। गांव बिजली-पानी के संकट से जूझ रहे हैं। सवाल उठता है – इन हालात में लोग कब तक जिंदगी खींच पाएंगे?
विस्थापन – कहने में आसान, करने में बेहद कठिन
राज्य में इस समय करीब 350 से अधिक गांवों को विस्थापन की जरूरत है। हर साल ये संख्या और बढ़ती जा रही है। लेकिन गांवों का विस्थापन केवल छत देने का मामला नहीं है। यह लोगों की जमीन, आजीविका, खेती, रोजगार और सामाजिक ताने-बाने से भी जुड़ा है। यही वजह है कि यह चुनौती और भी जटिल हो जाती है।
उत्तराखंड – आपदा का हॉटस्पॉट
इस मानसून में सबसे ज्यादा तबाही उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चमोली जिलों में हुई है। हालांकि, पूरा उत्तराखंड आज आपदा का हॉटस्पॉट बन चुका है। लाखों लोग प्रभावित हैं। केंद्र और राज्य सरकार की मदद कितनी पहुंच पाएगी, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।