12 साल बाद शुरू हुई मां नंदा देवी की बड़ी जात, 296 किमी पैदल यात्रा कर कैलास पहुंचेगा चौसिंग्या खाडू

चौसिंग्या खाडू की अगुआई में कुरुड़ नंदा धाम से शुरू हुई ऐतिहासिक यात्रा, 20 सितंबर को होमकुंड से कैलास के लिए होगी विदाई

चमोली। उत्तराखंड की लोक आस्था और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी मां नंदा देवी की 12 वर्षों में आयोजित होने वाली ऐतिहासिक बड़ी जात यात्रा शनिवार से शुरू हो गई। चमोली जिले के कुरुड़ स्थित नंदा धाम से मां नंदा देवी की डोली और यात्रा कैलास की ओर रवाना हुई। इस धार्मिक यात्रा को लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह है। वर्षों से इस पल का इंतजार कर रहे धियाणियों यानी ब्याहता बेटियों के साथ बड़ी संख्या में प्रवासी भी अपने गांव लौटे हैं।

मां नंदा देवी को उत्तराखंड की लोक आस्था में बेटी और धियाणी के रूप में विशेष स्थान प्राप्त है। इसी भाव के साथ आयोजित होने वाली बड़ी जात यात्रा में श्रद्धालु कठिन पहाड़ी रास्तों से गुजरते हुए मां नंदा को उनके मायके से कैलास तक विदा करते हैं। यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक आस्था का भी महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है।

296 किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा

इस बार बड़ी जात यात्रा करीब 296 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को दुर्गम पहाड़ी रास्तों, जंगलों और ऊंचाई वाले क्षेत्रों से होकर गुजरना होगा। यात्रा में कुल पांच निर्जन और 21 आबादी वाले पड़ाव शामिल हैं।

इस पूरी यात्रा की सबसे खास पहचान चौसिंग्या खाडू, यानी चार सींग वाला मेढ़ा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार चौसिंग्या खाडू यात्रा का नेतृत्व करता है और मां नंदा की कैलास यात्रा में उसका विशेष महत्व है।

यात्रा के दौरान श्रद्धालु विभिन्न पड़ावों पर रात्रि विश्राम करेंगे और परंपरागत धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लेंगे। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के यात्रा में शामिल होने की उम्मीद है।

20 सितंबर को होमकुंड से कैलास के लिए विदाई

बड़ी जात यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ावों में होमकुंड का विशेष स्थान है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 20 सितंबर को चौसिंग्या खाडू को होमकुंड से मां नंदा देवी के साथ कैलास के लिए विदा किया जाएगा।

यह क्षण यात्रा का सबसे भावुक और महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। इसके बाद धार्मिक परंपराओं के अनुसार यात्रा आगे बढ़ेगी और श्रद्धालु मां नंदा को कैलास की ओर विदाई देंगे।

धियाणियों और प्रवासियों की गांव वापसी

बड़ी जात यात्रा को लेकर चमोली और आसपास के क्षेत्रों में अलग ही उत्साह देखने को मिल रहा है। मां नंदा को अपनी बेटी मानने वाली धियाणियां बड़ी संख्या में अपने मायके पहुंची हैं। वर्षों बाद होने वाली इस यात्रा में शामिल होने के लिए प्रवासी भी अपने गांव लौटे हैं।

गांवों में यात्रा को लेकर तैयारियां लंबे समय से चल रही थीं। स्थानीय स्तर पर श्रद्धालुओं के स्वागत, ठहरने और यात्रा से जुड़ी व्यवस्थाओं को लेकर भी तैयारियां की गई हैं।

आस्था के साथ लोक संस्कृति का भी संगम

मां नंदा देवी की बड़ी जात उत्तराखंड की उन धार्मिक परंपराओं में शामिल है, जिनमें आस्था के साथ लोक संस्कृति और सामाजिक जुड़ाव भी दिखाई देता है। यात्रा में अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालु शामिल होते हैं और पूरी यात्रा के दौरान पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है।

कठिन पहाड़ी परिस्थितियों के बीच सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा श्रद्धालुओं की आस्था और संकल्प को दर्शाती है। यही वजह है कि 12 वर्ष में होने वाली इस यात्रा का उत्तराखंड के लोगों को लंबे समय से इंतजार रहता है।

यात्रा की वापसी भी होगी विशेष

कैलास की ओर मां नंदा की विदाई के बाद बड़ी जात विभिन्न पड़ावों से होते हुए देवराड़ा की ओर वापस लौटेगी। वापसी यात्रा भी निर्धारित धार्मिक परंपराओं और अनुष्ठानों के साथ पूरी की जाएगी।

12 साल के लंबे अंतराल के बाद शुरू हुई यह यात्रा आने वाले दिनों में उत्तराखंड के पहाड़ों में आस्था, संस्कृति और परंपरा का बड़ा केंद्र बनने जा रही है। कुरुड़ से शुरू हुई मां नंदा देवी की यह यात्रा अब 296 किलोमीटर का कठिन सफर तय करते हुए कैलास की ओर बढ़ेगी।

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