नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) में कार्यरत मेडिकल अधिकारियों द्वारा गैर-प्रैक्टिसिंग भत्ता (एनपीए) को वेतन का हिस्सा मानते हुए विभिन्न सेवा लाभों की गणना किए जाने की मांग से जुड़ी याचिकाओं का निस्तारण कर दिया है। हालांकि अदालत ने मामले के गुण-दोष पर अंतिम निर्णय देने के बजाय याचिकाकर्ताओं को केंद्र सरकार के समक्ष अपना पक्ष दोबारा रखने का अवसर प्रदान किया है।
न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने डॉ. श्याम सुंदर, डॉ. रजत अग्रवाल और डॉ. नितिन चावला द्वारा दायर याचिकाओं पर संयुक्त रूप से सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।
याचिकाकर्ता डॉक्टरों का कहना था कि ओएनजीसी के प्रशासनिक आदेश के कारण गैर-प्रैक्टिसिंग भत्ते (एनपीए) को मूल वेतन का हिस्सा नहीं माना जा रहा है। इसके चलते महंगाई भत्ता, मकान किराया भत्ता, ग्रेच्युटी, भविष्य निधि (पीएफ) तथा अन्य सेवा लाभों की गणना में उन्हें नुकसान उठाना पड़ रहा है। उनका तर्क था कि भारत सरकार के भारी उद्योग एवं लोक उद्यम मंत्रालय द्वारा समय-समय पर जारी कार्यालय ज्ञापनों के माध्यम से पूर्व के दिशा-निर्देशों में संशोधन किया जा चुका है, इसलिए उन्हें भी इन संशोधित प्रावधानों का लाभ मिलना चाहिए।
वहीं, ओएनजीसी की ओर से अदालत में दलील दी गई कि संबंधित नीति केवल उन केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों पर लागू होती है जो सीडीए (Central Dearness Allowance) वेतनमान प्रणाली का पालन करते हैं, जबकि ओएनजीसी अलग वेतन संरचना के अंतर्गत कार्य करता है। इसलिए याचिकाकर्ताओं की मांग नियमों के अनुरूप स्वीकार्य नहीं है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने अदालत से अनुरोध किया कि उन्हें सक्षम प्राधिकारी के समक्ष नया प्रतिवेदन प्रस्तुत करने की अनुमति दी जाए। इस पर ओएनजीसी की ओर से भी कोई आपत्ति नहीं जताई गई। दोनों पक्षों की सहमति को देखते हुए हाईकोर्ट ने याचिकाओं का निस्तारण करते हुए डॉक्टरों को आदेश की तिथि से तीन सप्ताह के भीतर भारत सरकार के भारी उद्योग एवं लोक उद्यम मंत्रालय के सचिव के समक्ष विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता प्रदान की।
खंडपीठ ने अपने आदेश में मंत्रालय के सचिव को निर्देश दिया कि प्रतिवेदन प्राप्त होने के बाद संबंधित नियमों और लागू नीतियों के अनुरूप पूरे मामले की गहन समीक्षा की जाए तथा अधिकतम छह माह के भीतर कारणयुक्त और अंतिम निर्णय पारित किया जाए।
अदालत के इस आदेश के बाद अब मामले का अंतिम निर्णय केंद्र सरकार के स्तर पर होगा। यदि मंत्रालय याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला देता है, तो ओएनजीसी के मेडिकल अधिकारियों के वेतन और अन्य सेवा लाभों की गणना में महत्वपूर्ण बदलाव संभव हो सकता है। वहीं यदि दावा खारिज किया जाता है, तो संबंधित पक्ष के पास पुनः न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का विकल्प खुला रहेगा।