चमोली के उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित वसुंधरा ताल से संभावित ग्लेशियर झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) के खतरे को देखते हुए केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की अत्याधुनिक स्वदेशी अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने जा रहा है। वैज्ञानिकों का लक्ष्य है कि संभावित खतरे की स्थिति में यह प्रणाली करीब एक घंटे पहले चेतावनी जारी कर सके।
सीबीआरआई के अनुसार, वसुंधरा ताल में सेंसर से लैस एक विशेष टॉवर लगाया जाएगा। इसमें ऐसे आधुनिक सेंसर होंगे जो बारिश, बर्फबारी, झील के आकार, जलस्तर और पानी के बहाव में होने वाले बदलावों की लगातार निगरानी करेंगे।
1-2 मिनट में कंट्रोल रूम तक पहुंचेगी सूचना
सिस्टम किसी भी असामान्य गतिविधि का पता लगने पर एक से दो मिनट के भीतर कंट्रोल रूम को सूचना भेज सकेगा। इसके लिए सेंसर को सैटेलाइट से जोड़ा जाएगा, जबकि घटनाक्रम की पुष्टि के लिए कैमरे भी लगाए जाएंगे।
हिमखंड के झील में गिरने, अचानक जलस्तर बढ़ने या प्राकृतिक बांध में दरार जैसी स्थिति का डेटा और तस्वीरें रीयल टाइम में निगरानी केंद्र तक पहुंचेंगी।
8-10 मिनट में 20 किमी नीचे पहुंच सकता है पानी
विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि वसुंधरा ताल का प्राकृतिक बांध टूटता है तो पानी और मलबा करीब 20 किलोमीटर नीचे तक महज 8 से 10 मिनट में पहुंच सकता है। ऐसे में शुरुआती चेतावनी का कुछ मिनट पहले मिलना भी बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
मनाली में पहले से काम कर रही तकनीक
सीबीआरआई ने इसी स्वदेशी तकनीक को पहले ढोंडी, मनाली में स्थापित किया था। वहां करीब एक साल से लगातार डेटा जुटाया जा रहा है। अब इसी अनुभव और तकनीक के आधार पर वसुंधरा ताल में सिस्टम लगाया जाएगा।
इस सिस्टम की डिजाइन और विकास में वैज्ञानिक चंद्रभान पटेल, कांति एल. सोलंकी और डॉ. डी.पी. कानूनगो की प्रमुख भूमिका रही है।
एक नजर में
- स्थान: वसुंधरा ताल, चमोली
- उद्देश्य: ग्लेशियर झील से संभावित खतरे की पूर्व चेतावनी
- संभावित चेतावनी: करीब 1 घंटे पहले
- सेंसर अलर्ट: 1-2 मिनट में कंट्रोल रूम तक
- निगरानी: बारिश, बर्फबारी, जलस्तर, झील का आकार और बहाव
- संभावित खतरा: 20 किमी क्षेत्र में 8-10 मिनट में पानी-मलबा पहुंचने की आशंका