2022 के विधानसभा चुनाव और 3 अक्टूबर 2026 की मतदाता सूची के आंकड़ों की तुलना में 13.40% की कमी का दावा; देहरादून कैंट, राजपुर रोड और धर्मपुर में भी बड़ी गिरावट, निर्वाचन आयोग से बूथवार जांच की मांग
देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूची में हुए बदलावों को लेकर जारी एक नई रिपोर्ट ने प्रदेश की चुनावी राजनीति और निर्वाचन प्रक्रिया से जुड़े कई सवाल खड़े किए हैं। सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल और प्रवीण उप्रेती ने 17 अक्टूबर को ‘SIR और 2022 से 2027 के विधानसभा चुनावों के बीच उत्तराखंड के बदलते मतदाता परिदृश्य’ शीर्षक से रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट में वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान दर्ज मतदाताओं की संख्या और 3 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची के आंकड़ों की तुलना करते हुए 11,07,695 मतदाताओं की कमी का दावा किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह गिरावट कुल मतदाताओं की संख्या का करीब 13.40 प्रतिशत है। जिलावार आंकड़ों में देहरादून में सबसे अधिक कमी सामने आने का दावा किया गया है। वहीं, विधानसभा क्षेत्रों में देहरादून कैंट, राजपुर रोड और धर्मपुर में मतदाताओं की संख्या में बड़ी गिरावट दर्ज किए जाने की बात कही गई है।
रिपोर्ट में महिला और पुरुष मतदाताओं की संख्या में आए बदलावों का भी विश्लेषण किया गया है। इसके आधार पर निर्वाचन आयोग से मतदाता सूची में हुए परिवर्तनों का विस्तृत विवरण सार्वजनिक करने और नामों में कमी के कारणों की विधानसभा क्षेत्रवार तथा मतदान केंद्रवार समीक्षा कराने की मांग की गई है।
उत्तराखंड में 11 लाख से अधिक मतदाताओं की कमी का दावा
रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के दौरान उत्तराखंड में कुल 82,66,644 मतदाता दर्ज थे। इसके मुकाबले 3 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में मतदाताओं की संख्या घटकर करीब 71.59 लाख रह गई।
दोनों आंकड़ों की तुलना के आधार पर 11,07,695 मतदाताओं की कमी का दावा किया गया है। रिपोर्ट तैयार करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि मतदाता सूची में इतने बड़े बदलाव को केवल आंकड़ों तक सीमित रखकर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसके पीछे के कारणों को भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि जिन राज्यों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया, उनमें उत्तराखंड में मतदाताओं की संख्या में प्रतिशत के लिहाज से सबसे अधिक गिरावट दर्ज हुई।
हालांकि, मतदाता सूची में नामों की संख्या कम होने का अर्थ अपने आप में यह नहीं है कि सभी नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं। इसके पीछे मृत्यु, स्थायी पलायन, दोहरी प्रविष्टियों का हटना, पंजीकरण में सुधार और अन्य प्रशासनिक कारण हो सकते हैं। इसलिए वास्तविक स्थिति जानने के लिए नाम हटाने के कारणों और संबंधित निर्वाचन आंकड़ों की विस्तृत जांच आवश्यक होगी।
दूसरे राज्यों की तुलना में उत्तराखंड में अधिक गिरावट का दावा
रिपोर्ट में विभिन्न राज्यों के मतदाता आंकड़ों की तुलना भी प्रस्तुत की गई है। इसमें उत्तराखंड में 13.40 प्रतिशत की गिरावट का दावा करते हुए अन्य राज्यों के आंकड़ों का उल्लेख किया गया है।
रिपोर्ट में दिए गए आंकड़े इस प्रकार हैं:
| राज्य | मतदाताओं की संख्या में बताई गई गिरावट |
|---|---|
| उत्तराखंड | 13.40% |
| उत्तर प्रदेश | 11.40% |
| गोवा | 9.18% |
| तमिलनाडु | 8.79% |
| पश्चिम बंगाल | 6.88% |
| मणिपुर | 5.28% |
| केरल | 1.12% |
| पंजाब | 0.70% |
रिपोर्ट के मुताबिक, इन आंकड़ों में उत्तराखंड की गिरावट सबसे अधिक है। हालांकि, रिपोर्ट में यह सावधानी भी बताई गई है कि अलग-अलग राज्यों में मतदाता सूची की संदर्भ तिथियों और पुनरीक्षण प्रक्रियाओं में अंतर हो सकता है। ऐसे में इन आंकड़ों की तुलना करते समय संबंधित राज्यों के आधिकारिक रिकॉर्ड और समान समयावधि को ध्यान में रखना जरूरी है।
देहरादून में करीब 3.03 लाख मतदाताओं की कमी
जिलावार आंकड़ों में देहरादून सबसे अधिक चर्चा में है। रिपोर्ट के अनुसार, जिले में करीब 3.03 लाख मतदाताओं की कमी दर्ज की गई है, जो लगभग 20.22 प्रतिशत बताई गई है।
इसके अलावा, रिपोर्ट में पौड़ी गढ़वाल, पिथौरागढ़ और टिहरी गढ़वाल में भी मतदाताओं की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट का दावा किया गया है।
| जिला | रिपोर्ट में बताई गई गिरावट |
|---|---|
| देहरादून | 20.22% |
| पौड़ी गढ़वाल | 14.89% |
| पिथौरागढ़ | 13.61% |
| टिहरी गढ़वाल | 13.14% |
देहरादून में सामने आए आंकड़ों को देखते हुए यह सवाल उठाया गया है कि मतदाताओं की संख्या में इतनी बड़ी कमी किन कारणों से हुई। क्या इसका संबंध पलायन से है, कितने नाम मृत्यु या दोहरी प्रविष्टियों के कारण हटाए गए और कितने मामलों में अन्य सुधार किए गए—इन सभी पहलुओं का स्पष्ट ब्योरा सामने आना जरूरी है।
रिपोर्ट तैयार करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इन आंकड़ों की विस्तृत समीक्षा और निर्वाचन आयोग की ओर से स्पष्टीकरण दिए जाने की जरूरत बताई है।
देहरादून कैंट, राजपुर रोड और धर्मपुर में भी बड़ी गिरावट
रिपोर्ट में विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़ों को भी सामने रखा गया है। इसके मुताबिक, देहरादून कैंट में मतदाताओं की संख्या में 34.19 प्रतिशत, राजपुर रोड में 32.64 प्रतिशत और धर्मपुर में 27.59 प्रतिशत की गिरावट का दावा किया गया है।
राजपुर रोड विधानसभा क्षेत्र के आंकड़े विशेष रूप से चर्चा में हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 में यहां 1,19,615 मतदाता थे, जबकि 2026 की अंतिम मतदाता सूची में इनकी संख्या घटकर 80,569 रह गई।
दूसरी ओर, रिपोर्ट में बदरीनाथ विधानसभा क्षेत्र में 91,555 और केदारनाथ विधानसभा क्षेत्र में 85,924 मतदाता दर्ज होने का उल्लेख किया गया है।
इन आंकड़ों के आधार पर रिपोर्ट में विधानसभा क्षेत्रों के बीच मतदाताओं की संख्या में आए अंतर की विस्तृत समीक्षा की मांग की गई है। खासतौर पर उन क्षेत्रों में बूथवार विश्लेषण जरूरी बताया गया है, जहां मतदाताओं की संख्या में प्रतिशत के लिहाज से अधिक गिरावट सामने आई है।
महिला मतदाताओं की संख्या में गिरावट को लेकर भी चिंता
रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू महिला और पुरुष मतदाताओं की संख्या में आए बदलावों से जुड़ा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों में से 36 सीटों पर महिला मतदाताओं की संख्या में प्रतिशत के लिहाज से गिरावट पुरुष मतदाताओं की तुलना में अधिक रही।
रिपोर्ट के अनुसार, ऊधम सिंह नगर, हरिद्वार, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी और अल्मोड़ा जिलों में भी इसी तरह की प्रवृत्ति सामने आई है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस अंतर को समझने के लिए महिला और पुरुष मतदाताओं के आंकड़ों का अलग-अलग विश्लेषण करने की जरूरत बताई है। इसके साथ ही यह जानना भी जरूरी माना गया है कि नाम हटाने की प्रक्रिया में महिलाओं के नाम किन कारणों से कम हुए और क्या संबंधित क्षेत्रों में मतदाता पंजीकरण से जुड़ी कोई विशेष समस्या सामने आई।
हालांकि, केवल महिला मतदाताओं की संख्या में अधिक गिरावट के आधार पर किसी अनियमितता का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए मतदाता सूची के मूल आंकड़ों, नाम हटाने के कारणों और संबंधित क्षेत्र की जनसांख्यिकीय परिस्थितियों का परीक्षण आवश्यक होगा।
2022 में द्वाराहाट था ऐसा क्षेत्र, जहां महिला मतदाता अधिक थीं
रिपोर्ट में महिला मतदाताओं के अनुपात को लेकर एक और महत्वपूर्ण दावा किया गया है। इसके अनुसार, वर्ष 2022 में द्वाराहाट विधानसभा क्षेत्र ऐसा था, जहां महिला मतदाताओं की संख्या पुरुष मतदाताओं से अधिक थी।
रिपोर्ट में शामिल 2026 की मतदाता सूची के आंकड़ों के अनुसार, इस बार किसी भी विधानसभा क्षेत्र में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से अधिक नहीं रही।
इस बदलाव को समझने के लिए रिपोर्ट में विधानसभा क्षेत्रवार और मतदान केंद्रवार जांच की मांग की गई है। इसमें महिला मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाए जाने और सूची में किए गए अन्य संशोधनों की जानकारी सार्वजनिक करने पर जोर दिया गया है।
अनूप नौटियाल बोले- मतदाता सूची में पारदर्शिता जरूरी
रिपोर्ट जारी करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल ने कहा कि मतदाता सूची में इतने बड़े बदलाव से पारदर्शिता, जवाबदेही और चुनावी प्रक्रिया पर जनता के भरोसे से जुड़े सवाल उठते हैं।
उनका कहना है कि निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है कि कोई भी पात्र नागरिक मतदाता सूची से बाहर न रह जाए। साथ ही, मतदाताओं को अपने नाम की स्थिति जानने और आवश्यक सुधार कराने में किसी प्रकार की परेशानी नहीं होनी चाहिए।
रिपोर्ट में निर्वाचन आयोग से मांग की गई है कि मतदाताओं की संख्या में आई कमी का विस्तृत ब्योरा सार्वजनिक किया जाए, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि कितने नाम मृत्यु, पलायन, दोहरी प्रविष्टियों और अन्य कारणों से हटाए गए।
निर्वाचन आयोग से विधानसभा और बूथवार विवरण जारी करने की मांग
रिपोर्ट में मतदाता सूची की पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं। इनमें प्रमुख रूप से निम्न मांगें शामिल हैं:
- वर्ष 2022 और 2026 की मतदाता सूचियों के बीच आए अंतर का विधानसभा क्षेत्रवार विवरण जारी किया जाए।
- मतदाताओं के नाम हटाने के कारणों—मृत्यु, पलायन, दोहरी प्रविष्टियां और अन्य संशोधनों—का अलग-अलग ब्योरा उपलब्ध कराया जाए।
- मतदान केंद्रवार मतदाताओं की संख्या में हुए बदलावों की जानकारी सार्वजनिक की जाए।
- महिला और पुरुष मतदाताओं के आंकड़ों का अलग-अलग विवरण जारी किया जाए।
- जिन विधानसभा क्षेत्रों में सबसे अधिक गिरावट दर्ज हुई है, वहां के आंकड़ों की विस्तृत समीक्षा की जाए।
- पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में अपना नाम जांचने और आवश्यक सुधार कराने की सुविधा उपलब्ध कराई जाए।
रिपोर्ट तैयार करने वालों का मानना है कि इन जानकारियों के सार्वजनिक होने से मतदाता सूची में आए बदलावों को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा और लोगों के सवालों का जवाब मिल सकेगा।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आंकड़ों की जांच क्यों अहम?
उत्तराखंड में अगले विधानसभा चुनाव वर्ष 2027 में होने हैं। ऐसे में मतदाता सूची में दर्ज नामों की संख्या, नए मतदाताओं का पंजीकरण और नामों में किए गए संशोधन चुनावी प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।
मतदाता सूची में नाम कम होने के पीछे वास्तविक कारणों को समझना इसलिए भी जरूरी है, ताकि पात्र मतदाता अपने मताधिकार से वंचित न रहें। वहीं, गलत या दोहराए गए नामों को हटाना भी एक सटीक और विश्वसनीय मतदाता सूची के लिए आवश्यक है।
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मतदाताओं की संख्या में दर्ज गिरावट का स्पष्ट और सत्यापन योग्य विवरण सामने आए। रिपोर्ट में उठाए गए सवालों का समाधान आधिकारिक आंकड़ों और निर्वाचन आयोग के स्पष्टीकरण से ही हो सकेगा।
फिलहाल, अनूप नौटियाल और प्रवीण उप्रेती की रिपोर्ट ने उत्तराखंड में मतदाता सूची में हुए बदलावों को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया है। अब देखना होगा कि निर्वाचन आयोग इन आंकड़ों पर क्या स्पष्टीकरण देता है और मतदाताओं की संख्या में आई कमी के कारणों को लेकर कितना विस्तृत विवरण उपलब्ध कराया जाता है।