चमोली : 06 किलोमीटर डंडी-कंडी में गर्भवती को ढोते रहे ग्रामीण, हेली सेवा भी फेल; इलाज के लिए रातभर भटकते रहे

चमोली के पिनाऊं गांव की तस्वीर ने खोली पहाड़ में सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की पोल, तीन किमी कुर्सी के सहारे चली महिला; देवाल अस्पताल के बाद बागेश्वर रेफर

थराली/चमोली। पहाड़ में सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर किए जा रहे तमाम दावों के बीच चमोली के दुर्गम गांवों की एक तस्वीर ने एक बार फिर जमीनी हकीकत सामने ला दी है। पिनाऊं और बलाण क्षेत्र की एक गर्भवती महिला की अचानक तबीयत बिगड़ने पर उसे अस्पताल तक पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को करीब 6 किलोमीटर तक डंडी-कंडी और कुर्सी के सहारे पैदल चलना पड़ा।

महिला को तत्काल उपचार की जरूरत थी। ग्रामीणों ने हेली सेवा के जरिए उसे अस्पताल पहुंचाने की कोशिश भी की, लेकिन क्षेत्र में कम विजिबिलिटी के कारण हेलीकॉप्टर आधे रास्ते से ही वापस लौट गया। इसके बाद ग्रामीणों के पास महिला को पैदल और फिर सड़क मार्ग से अस्पताल पहुंचाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।

कई घंटे की मशक्कत के बाद महिला को देर रात देवाल अस्पताल पहुंचाया गया। ग्रामीणों का आरोप है कि यहां भी उन्हें स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए परेशान होना पड़ा। बाद में महिला को रेफर किए जाने के बाद एंबुलेंस के लिए भी दो घंटे से ज्यादा इंतजार करना पड़ा और आखिरकार सुबह करीब चार बजे महिला को बागेश्वर अस्पताल पहुंचाया गया।

अचानक बिगड़ी 33 वर्षीय खिमली देवी की तबीयत

ग्रामीणों के मुताबिक पिनाऊं गांव निवासी खिमली देवी, पत्नी धन सिंह, उम्र 33 वर्ष गर्भवती हैं। अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। गांव में सड़क सुविधा नहीं होने के कारण परिजनों और ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन्हें तत्काल अस्पताल तक पहुंचाने की थी।

गांव से सड़क तक पहुंचने के लिए कोई सुगम मोटर मार्ग उपलब्ध नहीं होने के कारण ग्रामीणों ने डंडी-कंडी यानी डोली का इंतजाम किया। इसके बाद पैदल रास्ते को साफ किया गया और महिला को डंडी-कंडी में बैठाकर ग्रामीण अस्पताल की ओर निकल पड़े।

रास्ते में कई स्थानों पर रास्ता बंद होने के कारण ग्रामीणों को अतिरिक्त परेशानी का सामना करना पड़ा।

हेली सेवा की उम्मीद भी टूटी

महिला की स्थिति को देखते हुए ग्राम प्रधान लखपत दानू ने मामले की जानकारी थराली विधायक भूपाल राम टम्टा को दी। विधायक की ओर से महिला को तत्काल उपचार उपलब्ध कराने के लिए हेली सेवा की व्यवस्था कराने का प्रयास किया गया।

ग्रामीणों के मुताबिक दोपहर करीब 2 बजे वे महिला को लेकर बलाण गांव में हेलीकॉप्टर के लिए निर्धारित स्थान पर पहुंच गए। ग्रामीण काफी देर तक हेलीकॉप्टर का इंतजार करते रहे, लेकिन हेलीकॉप्टर वहां नहीं पहुंच सका।

बाद में जानकारी मिली कि क्षेत्र में विजिबिलिटी कम होने के कारण हेलीकॉप्टर आधे रास्ते से ही वापस लौट गया।

शाम तक इंतजार, फिर पैदल रास्ते का सहारा

ग्राम प्रधान लखपत दानू के मुताबिक हेली सेवा भेजने का प्रयास किया गया था, लेकिन खराब विजिबिलिटी के चलते हेलीकॉप्टर वापस लौट गया। ग्रामीणों ने शाम करीब 5:30 बजे तक इंतजार किया।

जब हेली सेवा के जरिए महिला को अस्पताल पहुंचाना संभव नहीं हुआ तो ग्रामीणों ने सड़क मार्ग से उसे अस्पताल ले जाने का फैसला किया।

इसके बाद महिला को करीब तीन किलोमीटर तक कुर्सी के सहारे पैदल ले जाया गया। ग्रामीणों ने बारी-बारी से महिला को कुर्सी पर बैठाकर दुर्गम रास्ता पार कराया। सड़क तक पहुंचने के बाद अलग-अलग वाहनों की मदद से महिला को देर रात देवाल अस्पताल पहुंचाया गया।

देवाल अस्पताल पहुंचकर भी नहीं मिली तत्काल राहत

ग्रामीणों का आरोप है कि देर रात देवाल अस्पताल पहुंचने पर वहां डॉक्टर मौजूद नहीं थे। ग्रामीणों के मुताबिक महिला की स्थिति के बारे में पहले ही फोन के माध्यम से एएनएम को जानकारी दे दी गई थी।

दोबारा सूचना दिए जाने के बाद एएनएम अस्पताल पहुंचीं। इसके बाद महिला की स्थिति को देखते हुए उसे आगे रेफर किया गया।

ग्रामीणों के अनुसार एंबुलेंस के लिए भी उन्हें दो घंटे से अधिक समय तक इंतजार करना पड़ा। इसके बाद महिला को आगे ले जाया गया और सुबह करीब 4 बजे बागेश्वर अस्पताल पहुंचाया गया।

विधायक बोले- विजिबिलिटी कम होने से वापस लौटा हेलीकॉप्टर

थराली विधायक भूपाल राम टम्टा ने कहा कि गर्भवती महिला और जच्चा-बच्चे के स्वास्थ्य को देखते हुए तत्काल हेली सेवा की व्यवस्था कराने का प्रयास किया गया था। लेकिन क्षेत्र में विजिबिलिटी कम होने के कारण हेलीकॉप्टर आधे रास्ते से ही वापस लौट गया।

इसके बाद ग्रामीणों ने महिला को डंडी-कंडी के माध्यम से अस्पताल तक पहुंचाया।

ग्रामीणों का सवाल- आखिर कब खत्म होगा सड़क का इंतजार?

इस घटना के बाद ग्रामीणों ने सड़क सुविधा को लेकर एक बार फिर सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब सड़क सुविधा के अभाव में किसी मरीज को डंडी-कंडी या कुर्सी के सहारे अस्पताल पहुंचाना पड़ा हो।

दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर मरीजों को आज भी सड़क तक पहुंचाने के लिए डंडी-कंडी, डोली, कुर्सी या पैदल रास्तों का सहारा लेना पड़ता है।

ग्रामीणों का कहना है कि सरकार और जनप्रतिनिधियों की ओर से सड़क तथा स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कई गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं।

सड़क के साथ अस्पतालों में डॉक्टर और आपात सुविधा की मांग

ग्रामीणों ने सरकार और जनप्रतिनिधियों से पिनाऊं और आसपास के क्षेत्रों को सड़क सुविधा से जोड़ने की मांग की है। इसके साथ ही स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त डॉक्टर, मेडिकल स्टाफ, एंबुलेंस और आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग भी उठाई है।

ग्रामीणों का कहना है कि किसी आपात स्थिति में अस्पताल तक पहुंचने में ही कई घंटे लग जाते हैं। यदि रास्ते में मौसम खराब हो जाए या हेली सेवा उपलब्ध न हो तो मरीज और उसके परिजनों की मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं।

चमोली की यह घटना पहाड़ में स्वास्थ्य और सड़क कनेक्टिविटी के बीच मौजूद उस बड़ी चुनौती को फिर सामने लाती है, जहां बीमारी से ज्यादा मुश्किल कई बार मरीज को अस्पताल तक पहुंचाना बन जाता है।

सवाल अब भी वही है—आखिर पहाड़ के दुर्गम गांवों में रहने वाले लोगों को इलाज के लिए कब तक डंडी-कंडी और कुर्सी का सहारा लेना पड़ेगा?

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