एससी/एसटी एक्ट मामलों में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, लोक सेवकों के खिलाफ मुकदमे से पहले प्रशासनिक जांच जरूरी

नैनीताल। उत्तराखंड में अनुसूचित जाति एवं जनजाति (एससी/एसटी) अधिनियम के तहत सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर Uttarakhand High Court ने महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी लोक सेवक के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने से पहले प्रशासनिक जांच कराना अनिवार्य होगा।

यह फैसला न्यायमूर्ति Alok Mehra की एकलपीठ ने तत्कालीन सीओ Bhupendra Dhoni और उपनिरीक्षक Ramesh Bohra की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया।

अदालत ने कहा कि किसी भी लोक सेवक के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने से पहले प्रशासनिक जांच में आरोपों की पुष्टि और संस्तुति आवश्यक है। न्यायालय ने माना कि बिना ऐसी जांच रिपोर्ट के मुकदमा दर्ज करने के निर्देश देना स्थापित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है।

मामला वर्ष 2024 का है, जब एक महिला ने सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत आवेदन देकर जातिसूचक टिप्पणी, दुर्व्यवहार और मारपीट के आरोप लगाए थे। हालांकि पुलिस जांच में आरोपों की पुष्टि नहीं हुई थी, जिसके चलते मुकदमा दर्ज नहीं किया गया।

बाद में जिला एवं सत्र न्यायालय ने संबंधित युवक के साथ-साथ तत्कालीन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भी एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए दोनों अधिकारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि सरकारी अधिकारियों एवं कर्मचारियों के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने से पूर्व प्रशासनिक जांच अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए।

इस फैसले को राज्य में लोक सेवकों के विरुद्ध एससी/एसटी एक्ट के मामलों में कानूनी प्रक्रिया और जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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