विकासनगर में पुल के अभाव में ग्रामीणों की जिंदगी बनी जोखिम भरी, बरसात में नदी पार करना रोज की मजबूरी
विकासनगर। उत्तराखंड में मानसून के दौरान पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। विकासनगर के जौनसार-बावर क्षेत्र से ऐसी ही तस्वीर सामने आई है, जहां 2013 की आपदा में ध्वस्त हुआ अमलावा नदी का पुल आज तक दोबारा नहीं बन पाया है। पुल के अभाव में ग्रामीणों को बरसात के मौसम में उफनती अमलावा नदी पार करके अपने खेतों और गांवों तक पहुंचना पड़ रहा है।
अमलावा नदी इन दिनों बारिश के कारण पूरे उफान पर है। नदी का जलस्तर बढ़ने के बावजूद ग्रामीणों के सामने कोई सुरक्षित विकल्प नहीं है। मजबूरी में लोग अपनी जान हथेली पर रखकर नदी पार कर रहे हैं। कई स्थानों पर ग्रामीण एक-दूसरे और डंडों का सहारा लेकर तेज बहाव वाली नदी को पार करने की कोशिश करते हैं।
2013 की आपदा में ढह गया था पुल
जौनसार-बावर क्षेत्र में अमलावा नदी पर बना पुल वर्ष 2013 की विनाशकारी आपदा में ढह गया था। इसके बाद से ग्रामीण लगातार पुल के दोबारा निर्माण की मांग कर रहे हैं, लेकिन आज तक यहां पुल का निर्माण नहीं हो सका है।
पुल नहीं होने के कारण बरसात का मौसम शुरू होते ही ग्रामीणों की मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं। नदी का जलस्तर बढ़ने पर अमलावा को पार करना बेहद जोखिम भरा हो जाता है। इसके बावजूद ग्रामीणों को अपने खेतों तक पहुंचने और रोजमर्रा के जरूरी कामों के लिए नदी पार करनी पड़ती है।
उफनती लहरों से जूझना बनी ग्रामीणों की मजबूरी
चकराता तहसील क्षेत्र के ग्रामीणों के लिए अमलावा नदी पर पुल का निर्माण लंबे समय से एक बड़ी मांग बना हुआ है। बरसात के दिनों में नदी का जलस्तर बढ़ने के कारण ग्रामीणों के लिए अपने खेतों तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार संबंधित विभाग और प्रशासन को अपनी समस्या से अवगत कराया, लेकिन अभी तक इस दिशा में ठोस कार्रवाई नहीं हुई। हर साल बरसात के दौरान स्थिति और ज्यादा गंभीर हो जाती है और ग्रामीणों को अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती है।
पूर्व प्रधान बोले- कई बार शिकायत की, फिर भी नहीं हुई कार्रवाई
नराया गांव के पूर्व प्रधान श्रीचंद तोमर ने कहा कि ग्रामीण लंबे समय से पुल निर्माण की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी समस्या पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
“संबंधित विभाग को कई बार अवगत कराया गया, लेकिन कोई भी सुध लेने के लिए तैयार नहीं है। उपजिलाधिकारी कालसी-चकराता को इसके बारे में जानकारी है, लेकिन आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है।”
एक दर्जन पुल आपदा की भेंट चढ़े
ग्रामीणों के मुताबिक अमलावा नदी पर पहले करीब एक दर्जन पुल बने हुए थे, लेकिन आपदाओं के दौरान ये पुल भी ध्वस्त हो गए। इन पुलों के दोबारा निर्माण नहीं होने से आसपास के कई गांवों के लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
पानुवा, मलेथा, उदपाल्टा, कुरोली, कोठा तारली, सैंज, सैंसा, नराया, चिबऊ, कोटि और कोरूवा समेत कई गांवों के ग्रामीण पुलों के अभाव की समस्या झेल रहे हैं।
इन गांवों के लोगों के लिए नदी के उस पार उनकी कृषि भूमि है। ऐसे में खेती-किसानी के काम के लिए भी उन्हें नदी पार करनी पड़ती है। बरसात में जब नदी का बहाव तेज होता है, तब खेतों तक पहुंचना जान जोखिम में डालने जैसा हो जाता है।
एक-दूसरे और डंडों के सहारे नदी पार करते हैं ग्रामीण
अमलावा नदी का जलस्तर बढ़ने के बाद ग्रामीणों के पास सुरक्षित आवागमन का कोई साधन नहीं बचता। कई बार ग्रामीण एक-दूसरे का सहारा लेकर और डंडों की मदद से नदी पार करने की कोशिश करते हैं।
ऐसी स्थिति में जरा सी चूक किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती है। इसके बावजूद वर्षों से चली आ रही इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाया है।
ग्रामीण पीताम्बर सिंह, पूरण सिंह तोमर, रतन सिंह तोमर, गोपाल राठौर, राजेंद्र सिंह राय और सुरेंद्र सिंह तोमर का कहना है कि क्षेत्र में वर्ष 2010 के बाद लगातार कई बार आपदाएं आईं, जिनमें पुलों को भारी नुकसान पहुंचा और कई पुल पूरी तरह ध्वस्त हो गए। उनका आरोप है कि इसके बाद शासन-प्रशासन ने दोबारा इन पुलों की सुध नहीं ली।
25 परिवारों की पशुशाला और कृषि भूमि नदी के पार
ग्रामीणों के अनुसार नदी के दूसरी तरफ सलगा, बोहा और नराया गांव के करीब 25 परिवारों की पशुशालाएं, छानियां और कृषि भूमि मौजूद हैं। इसके अलावा दूसरे गांवों के लिए भी नदी पार करके जाने वाला पैदल मार्ग है।
पुलिया या पुल की सुविधा नहीं होने के कारण इन परिवारों को विशेष रूप से बरसात के मौसम में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। पशुओं की देखभाल से लेकर खेतों में काम करने तक के लिए लोगों को खतरनाक नदी पार करनी पड़ती है।
एसडीएम ने विभाग को निर्देश देने की बात कही
इस मामले में एसडीएम कालसी प्रेमलाल का कहना है कि क्षतिग्रस्त और नए पुलों के निर्माण के लिए संबंधित विभाग को निर्देशित किया जाएगा।
ग्रामीणों को अब उम्मीद है कि प्रशासन इस बार उनकी वर्षों पुरानी समस्या का स्थायी समाधान करेगा और अमलावा नदी पर पुल का निर्माण कराया जाएगा, ताकि बरसात के दौरान लोगों को अपनी जान जोखिम में डालकर नदी पार न करनी पड़े।
सवाल बरकरार: 13 साल बाद भी पुल का इंतजार क्यों?
वर्ष 2013 की आपदा को करीब 13 वर्ष बीत चुके हैं। इस दौरान कई सरकारें और प्रशासनिक अधिकारी बदले, लेकिन अमलावा नदी पर पुल का इंतजार खत्म नहीं हुआ। मानसून आते ही ग्रामीणों की वही पुरानी परेशानी फिर सामने आ जाती है।
एक ओर उत्तराखंड में सड़क, पुल और कनेक्टिविटी को विकास की प्राथमिकताओं में शामिल किया जाता है, वहीं दूसरी ओर जौनसार-बावर के ग्रामीण आज भी उफनती नदी को पार करने के लिए मजबूर हैं। अमलावा नदी की तेज धार के बीच ग्रामीणों की यह तस्वीर व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि आखिर आपदा के 13 साल बाद भी सुरक्षित आवागमन की सुविधा क्यों नहीं मिल पाई?