न बोल पाए, न सुन पाए… दो बैलों के सहारे जिंदगी; अभावों में घिरा नरेंद्र का दर्द, सिस्टम पर सवाल

रुद्रप्रयाग। सरकारी योजनाओं का मकसद अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुंचाना होता है, लेकिन जब कोई जरूरतमंद वर्षों तक उनसे वंचित रह जाए तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसा ही मामला जनपद रुद्रप्रयाग की बच्छणस्यूं पट्टी के क्वल्ली गांव से सामने आया है, जहां बुजुर्ग नरेंद्र सिंह पंवार अभावों के बीच जिंदगी काटने को मजबूर हैं।

न आधार कार्ड, न पेंशन… संवाद करने में भी असमर्थ

नरेंद्र सिंह बोल और सुन नहीं सकते, जिसके कारण वह अपनी समस्या किसी के सामने रख भी नहीं पाते। उनके पास न आधार कार्ड है और न ही कोई नियमित आय का साधन।

संपत्ति और परिवार के नाम पर उनके पास सिर्फ दो बैल हैं, जिन्हें वह किसी भी हालत में छोड़ना नहीं चाहते। यही उनकी जिंदगी का सहारा भी हैं और लगाव भी।

राशन कार्ड खोया, अब दूसरों की दया पर जीवन

ग्रामीणों के अनुसार नरेंद्र सिंह को पहले राशन कार्ड के जरिए सरकारी गल्ले से राशन मिल जाता था, लेकिन कार्ड गुम होने के बाद उन्हें यह सुविधा भी नहीं मिल रही।

उन्हें—

  • न विकलांग पेंशन मिलती है

  • न अंत्योदय योजना का लाभ

अब उनकी रोजमर्रा की जरूरतें गांव वालों की मदद से ही पूरी होती हैं।

गांव के बुजुर्ग रघुवीर सिंह रावत बताते हैं कि वह एक-दो बार नरेंद्र को सरकारी दफ्तरों तक भी ले गए, लेकिन कागजी प्रक्रिया पूरी न होने के कारण कोई लाभ नहीं मिल सका।

बैलों को छोड़कर नहीं जाते, इसलिए अटकी कागजी प्रक्रिया

ग्राम प्रधान ममता देवी का कहना है कि वह वर्षों से नरेंद्र को इसी हालत में देख रही हैं। ग्रामीण ही मिलकर उनकी आजीविका चलाते हैं।

नरेंद्र अपने बैलों को छोड़कर कहीं नहीं जाते, जिससे सरकारी योजनाओं के लिए जरूरी दस्तावेज और प्रक्रिया पूरी करना मुश्किल हो जाता है।

21वीं सदी में भी मूलभूत सुविधाओं से दूर

उक्रांद नेता अर्जुन कंडारी ने कहा कि आज हम 21वीं सदी में हैं, लेकिन लोग अब भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने सरकार से नरेंद्र की मदद करने की मांग की है।

प्रशासन ने लिया संज्ञान

इस मामले पर मुख्य विकास अधिकारी राजेंद्र सिंह रावत ने कहा कि मामला उनके संज्ञान में आया है। कारणों की जांच की जाएगी और वह स्वयं प्रभावित व्यक्ति तक पहुंचकर उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने का प्रयास करेंगे।

सिस्टम के सामने बड़ा सवाल

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की परेशानी नहीं, बल्कि उन योजनाओं की जमीनी हकीकत को भी दिखाता है जो कागजों में तो चलती हैं, लेकिन कई बार जरूरतमंद तक नहीं पहुंच पातीं।

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