पिथौरागढ़: उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ से एक बार फिर पहाड़ की पीड़ा और जमीनी हकीकत सामने आई है, जहां आधुनिक सुविधाओं के दावों के बीच आज भी लोगों को बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जान जोखिम में डालनी पड़ रही है।
धारचूला क्षेत्र के कनार गांव में एक गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा होने पर ग्रामीणों को उसे डोली में उठाकर करीब 16 किलोमीटर दूर बरम तक ले जाना पड़ा। उबड़-खाबड़ रास्तों, लगातार बारिश और कड़ाके की ठंड के बीच यह सफर किसी संघर्ष से कम नहीं था।
बारिश, बर्फ और फिसलन भरे रास्तों में जीवन की जंग
कनार गांव निवासी गणेश सिंह की 24 वर्षीय पत्नी हेमा देवी को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हुई। गांव तक सड़क सुविधा नहीं होने के कारण एंबुलेंस पहुंचना संभव नहीं था। ऐसे में गांव के युवाओं ने ही जिम्मेदारी उठाई और डोली बनाकर हेमा देवी को अस्पताल तक पहुंचाने का फैसला लिया।
लगातार हो रही बारिश और ऊंचाई वाले इलाकों में हो रहे हिमपात के कारण रास्ता बेहद खतरनाक हो चुका था। फिसलन भरे संकरे रास्तों पर एक-एक कदम संभलकर रखते हुए चार युवाओं ने डोली को कंधों पर उठाया और करीब पांच घंटे तक पैदल चलते रहे। इस दौरान प्रसूता दर्द से कराहती रही और युवक पूरी तरह भीग गए।
5 घंटे का संघर्ष, तब मिली राहत
करीब पांच घंटे की कठिन यात्रा के बाद ग्रामीण किसी तरह हेमा देवी को बरम स्थित एएनएम सेंटर तक पहुंचाने में सफल रहे। यहां महिला को भर्ती किया गया, जहां सुरक्षित प्रसव कराया गया। हालांकि यह राहत अस्थायी ही मानी जा रही है, क्योंकि क्षेत्र में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का अब भी अभाव है।
100 किलोमीटर दूर अस्पताल, तब मिलती है सही सुविधा
बरम से लेकर बंगापानी तक कहीं भी एलोपैथिक स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध नहीं है। बरम में भी केवल आयुर्वेदिक अस्पताल है और विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के चलते गंभीर मामलों में मरीजों को करीब 100 किलोमीटर दूर जिला अस्पताल भेजना पड़ता है। ऐसे में हर आपात स्थिति ग्रामीणों के लिए परीक्षा बन जाती है।
सड़क न होने से हर दिन चुनौती
कनार गांव आज भी सड़क सुविधा से वंचित है। गांव के लोगों का कहना है कि बीमार पड़ने या गर्भवती महिलाओं के लिए यही डोली ही एंबुलेंस बन जाती है। वर्षों से सड़क की मांग उठाई जा रही है, लेकिन वन भूमि की अड़चन के कारण निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पा रहा है।
प्रशासन से उम्मीदें, लेकिन इंतजार जारी
हाल ही में ग्रामीण अपनी मांग को लेकर जिला मुख्यालय पहुंचे थे, जहां जिलाधिकारी आशीष भटगांई ने उन्हें आश्वासन दिया है। अधिकारियों के साथ बैठक में समाधान निकालने की बात कही गई है, लेकिन जमीनी स्तर पर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
विकास के दावों के बीच कड़वी सच्चाई
यह घटना एक बार फिर सवाल खड़े करती है कि आखिर कब तक पहाड़ के लोग ऐसी मुश्किलों का सामना करते रहेंगे। जहां एक ओर विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गर्भवती महिलाओं को डोली में ढोकर अस्पताल पहुंचाना पड़ रहा है।
पहाड़ की यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उन तमाम दूरस्थ इलाकों की है जहां आज भी सड़क, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं लोगों के लिए सपना बनी हुई हैं।