नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रुद्रप्रयाग में चौकीदार की करंट लगने से हुई मौत से जुड़े मुआवजा मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि ‘कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923’ के तहत मुआवजे की जिम्मेदारी केवल कर्मचारी के नियोक्ता की होती है। किसी तीसरे पक्ष या विभाग पर इस अधिनियम के तहत मुआवजा देने का आदेश नहीं दिया जा सकता, भले ही दुर्घटना कथित लापरवाही के कारण हुई हो। न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की एकलपीठ ने उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPCL) की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए कर्मचारी मुआवजा आयुक्त, रुद्रप्रयाग के आदेश में संशोधन किया। क्या था मामला? मृतक दिनेश प्रसाद डिमरी अगस्त्यमुनि स्थित फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में चौकीदार के पद पर कार्यरत थे। 21 अक्टूबर 2012 को वे पानी की आपूर्ति बाधित होने का कारण देखने गए थे। इसी दौरान टूटे हुए बिजली के तार की चपेट में आने से उन्हें करंट लगा और मौके पर ही उनकी मौत हो गई। मृतक की पत्नी ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत मुआवजे का दावा किया। सुनवाई के बाद कर्मचारी मुआवजा आयुक्त, रुद्रप्रयाग ने ₹4,15,480 का मुआवजा देने का आदेश पारित किया और यह जिम्मेदारी बिजली विभाग पर डालते हुए कहा कि टूटे हुए तार की समय पर मरम्मत न होना विभाग की लापरवाही थी। हाईकोर्ट ने क्या कहा? इस आदेश को चुनौती देते हुए उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कंपनी का तर्क था कि मृतक उनका कर्मचारी नहीं था, इसलिए कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत उन पर मुआवजे की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 का उद्देश्य नियोक्ता द्वारा अपने कर्मचारी को कार्य के दौरान हुई दुर्घटना या मृत्यु पर मुआवजा देना है। इस कानून के तहत किसी तीसरे पक्ष, विभाग या संस्था पर जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि चूंकि मृतक डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर के अधीन कार्यरत थे, इसलिए मुआवजे की जिम्मेदारी भी उनके नियोक्ता यानी वन विभाग की होगी, न कि उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड की। आदेश में संशोधन हाईकोर्ट ने कर्मचारी मुआवजा आयुक्त के आदेश में संशोधन करते हुए निर्देश दिया कि मुआवजे की पूरी राशि, ब्याज सहित, उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के बजाय संबंधित डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (वन विभाग) द्वारा अदा की जाएगी। यह फैसला कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के दायरे और नियोक्ता की कानूनी जिम्मेदारी को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रुद्रप्रयाग में चौकीदार की करंट लगने से हुई मौत से जुड़े मुआवजा मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि ‘कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923’ के तहत मुआवजे की जिम्मेदारी केवल कर्मचारी के नियोक्ता की होती है। किसी तीसरे पक्ष या विभाग पर इस अधिनियम के तहत मुआवजा देने का आदेश नहीं दिया जा सकता, भले ही दुर्घटना कथित लापरवाही के कारण हुई हो।

 

न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की एकलपीठ ने उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPCL) की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए कर्मचारी मुआवजा आयुक्त, रुद्रप्रयाग के आदेश में संशोधन किया।

 

क्या था मामला?

 

मृतक दिनेश प्रसाद डिमरी अगस्त्यमुनि स्थित फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में चौकीदार के पद पर कार्यरत थे। 21 अक्टूबर 2012 को वे पानी की आपूर्ति बाधित होने का कारण देखने गए थे। इसी दौरान टूटे हुए बिजली के तार की चपेट में आने से उन्हें करंट लगा और मौके पर ही उनकी मौत हो गई।

 

मृतक की पत्नी ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत मुआवजे का दावा किया। सुनवाई के बाद कर्मचारी मुआवजा आयुक्त, रुद्रप्रयाग ने ₹4,15,480 का मुआवजा देने का आदेश पारित किया और यह जिम्मेदारी बिजली विभाग पर डालते हुए कहा कि टूटे हुए तार की समय पर मरम्मत न होना विभाग की लापरवाही थी।

 

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

 

इस आदेश को चुनौती देते हुए उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कंपनी का तर्क था कि मृतक उनका कर्मचारी नहीं था, इसलिए कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत उन पर मुआवजे की जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।

 

हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 का उद्देश्य नियोक्ता द्वारा अपने कर्मचारी को कार्य के दौरान हुई दुर्घटना या मृत्यु पर मुआवजा देना है। इस कानून के तहत किसी तीसरे पक्ष, विभाग या संस्था पर जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।

 

कोर्ट ने कहा कि चूंकि मृतक डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर के अधीन कार्यरत थे, इसलिए मुआवजे की जिम्मेदारी भी उनके नियोक्ता यानी वन विभाग की होगी, न कि उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड की।

 

आदेश में संशोधन

 

हाईकोर्ट ने कर्मचारी मुआवजा आयुक्त के आदेश में संशोधन करते हुए निर्देश दिया कि मुआवजे की पूरी राशि, ब्याज सहित, उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के बजाय संबंधित डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (वन विभाग) द्वारा अदा की जाएगी।

 

यह फैसला कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के दायरे और नियोक्ता की कानूनी जिम्मेदारी को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।

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