बागेश्वर खड़िया खनन मामला: हाईकोर्ट से अल्मोड़ा मैग्नेसाइट कंपनी को राहत, बाकी 165 इकाइयों पर रोक बरकरार

नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय में बागेश्वर जिले की कांडा तहसील समेत अन्य गांवों में खड़िया खनन से आई दरारों के मामले में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले में सुनवाई के बाद अल्मोड़ा मैग्नेसाइट कंपनी को बड़ी राहत देते हुए पुनः संचालन की अनुमति प्रदान कर दी है।

शर्तों के साथ काम करने की अनुमति

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कंपनी को दोबारा खनन कार्य शुरू करने से पहले राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सभी मानकों का पालन करना होगा। साथ ही हाईकोर्ट के आदेश के चार महीने के भीतर उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UKPCB) से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) लेना अनिवार्य होगा।
यदि तय समयावधि में एनओसी प्राप्त नहीं किया जाता है तो कोर्ट का आदेश स्वतः प्रभावहीन हो जाएगा।

अन्य खनन इकाइयों को नहीं मिली राहत

मामले से जुड़ी 165 अन्य खनन इकाइयों की याचिकाओं पर भी सुनवाई हुई, लेकिन न्यायालय ने फिलहाल उन्हें कोई अंतरिम राहत नहीं दी है। इन इकाइयों पर पूर्व में लगी रोक यथावत रखी गई है।

सरकार ने रखा राजस्व का पक्ष

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि अल्मोड़ा मैग्नेसाइट कंपनी के बंद होने से सरकार को राजस्व का नुकसान हो रहा है, इसलिए उसे दोबारा संचालन की अनुमति दी जानी चाहिए।
सरकार ने यह भी कहा कि कंपनी ने कोई अवैध खनन नहीं किया है और उसने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों व अनुमति का पालन किया है। कंपनी सभी आवश्यक मानकों को पूरा करती है, इसलिए उस पर लगी रोक हटाई जानी चाहिए।

कोर्ट का निर्देश – नियमों का कड़ाई से पालन

न्यायालय ने कंपनी को राहत देते हुए कहा कि वह सभी वैधानिक नियमों और पर्यावरणीय मानकों का कड़ाई से अनुपालन करे। साथ ही स्पष्ट किया कि अन्य खनन इकाइयों पर लगी रोक को लेकर फिलहाल कोई राहत नहीं दी जा रही है।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल बागेश्वर जिले की कांडा तहसील के ग्रामीणों ने पूर्व में मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजकर अवैध खड़िया खनन से हो रहे नुकसान की शिकायत की थी। ग्रामीणों का आरोप है कि खनन के कारण उनके घरों, खेतों और पानी की लाइनों में दरारें आ गई हैं और आजीविका के साधन समाप्त हो गए हैं।
उन्होंने बताया कि आर्थिक रूप से सक्षम लोग अपने घर हल्द्वानी और अन्य स्थानों पर बना कर पलायन कर चुके हैं, जबकि गरीब ग्रामीण अब भी वहीं रहने को मजबूर हैं।

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि खनन से जुड़े लोगों की नजर अब उनके बचे हुए संसाधनों पर है। उन्होंने कई बार प्रशासन और उच्चाधिकारियों को शिकायतें दीं, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। इसके बाद न्याय की उम्मीद में न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया।

Leave A Reply

Your email address will not be published.

https://www.breaknwaves.com/jet_skis_boat_rentals.html