भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में ‘अहम’ की जंग बन रही चुनौती, विचारधारा बनाम व्यक्तिवाद की बहस तेज

देहरादून। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर इन दिनों चल रही गुटबाजी और नेताओं के बीच अहम की लड़ाई ने संगठनात्मक एकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। “हम हैं तो कांग्रेस है” जैसी सोच न सिर्फ पार्टी के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है, बल्कि यह उस मूल विचारधारा के भी विपरीत है, जिस पर कांग्रेस की नींव टिकी है।

वरिष्ठ नेता हरीश रावत जैसे नेताओं का नाम इस संदर्भ में चर्चा में है। यदि कोई नेता इस धारणा के साथ राजनीति करता है कि पार्टी का अस्तित्व केवल उसी पर निर्भर है, तो यह एक बड़ा भ्रम साबित हो सकता है। कांग्रेस का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि पार्टी किसी एक व्यक्ति विशेष पर आधारित नहीं रही, बल्कि एक व्यापक विचारधारा के रूप में विकसित हुई है।

ऐसे नेताओं को एन. डी. तिवारी जैसे दिग्गजों से सीख लेने की आवश्यकता है, जिन्होंने संगठन को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर रखा। कांग्रेस कई बार चुनावी हार का सामना कर चुकी है, लेकिन इससे उसके अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। पार्टी ने हर बार खुद को पुनर्गठित कर नई ऊर्जा के साथ वापसी की है।

कांग्रेस के भीतर वर्षों से ‘मैं बड़ा नेता’ की प्रवृत्ति देखने को मिलती रही है। कई नेता आए, अपने वर्चस्व को स्थापित करने की कोशिश की और समय के साथ राजनीतिक परिदृश्य से बाहर हो गए। यह स्थिति आज भी बनी हुई है, जहां कुछ नेता और कार्यकर्ता सीमित समर्थन के आधार पर संगठन को चुनौती देने का प्रयास कर रहे हैं।

वहीं दूसरी ओर, कांग्रेस नेतृत्व स्पष्ट संदेश दे चुका है। राहुल गांधी ने कई मंचों से यह साफ किया है कि जो लोग पार्टी की विचारधारा के साथ खड़े रहना चाहते हैं, वे रहें—और जो नहीं, उनके लिए दरवाजे खुले हैं। यह संदेश पार्टी के भीतर अनुशासन और प्रतिबद्धता को लेकर एक स्पष्ट रेखा खींचता है।

पिछले एक दशक से अधिक समय तक सत्ता से बाहर रहने के बावजूद कांग्रेस ने भारतीय राजनीति में अपनी मौजूदगी बनाए रखी है और भारतीय जनता पार्टी जैसी मजबूत राजनीतिक ताकत को चुनौती देती रही है। कई नेता विभिन्न कारणों से पार्टी छोड़कर भाजपा या अन्य दलों में शामिल हुए, लेकिन कांग्रेस का संघर्ष जारी रहा।

राजनीति केवल निजी स्वार्थों की पूर्ति का माध्यम नहीं हो सकती—यह संदेश भी राहुल गांधी लगातार देने का प्रयास कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में पार्टी एक वैचारिक संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ रही है, जहां व्यक्तिगत हितों से ऊपर संगठन और विचारधारा को प्राथमिकता दी जा रही है।

उत्तराखंड कांग्रेस में इस समय नेताओं के बीच अपनी-अपनी अहमियत साबित करने की जो होड़ चल रही है, वह पार्टी की केंद्रीय सोच से मेल नहीं खाती। ऐसे में संत कबीर की प्रसिद्ध उक्ति “जो घर फूंके अपना, चले हमारे साथ” अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होती है।

इसका अर्थ यही है कि कांग्रेस और उसके नेतृत्व के साथ वही लोग आगे बढ़ सकते हैं, जो निजी स्वार्थों का त्याग कर संगठन के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखते हों। अन्यथा, ऐसे लोगों का अलग हो जाना ही उनके और पार्टी—दोनों के हित में माना जा सकता

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