लोकायुक्त की नियुक्ति पर फिर घमासान, कांग्रेस ने भाजपा को घेरा; बोली- 9 साल से क्यों लटका मामला?

2017 में 100 दिन के भीतर लोकायुक्त लाने का वादा, नौ साल बाद भी पद खाली; कांग्रेस ने सरकार की मंशा पर उठाए सवाल, भाजपा बोली- भ्रष्टाचार के खिलाफ सीएम धामी खुद कर रहे कार्रवाई

देहरादून। उत्तराखंड में लोकायुक्त की नियुक्ति का मुद्दा एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में आ गया है। प्रदेश में करीब नौ वर्षों से लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं होने को लेकर कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावा करने वाली सरकार लोकायुक्त जैसी महत्वपूर्ण संस्था को लेकर गंभीर नहीं है। वहीं भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी स्वयं भ्रष्टाचार के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रहे हैं और लोकायुक्त के चयन की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है।

2017 के वादे को लेकर कांग्रेस का हमला

कांग्रेस प्रदेश महामंत्री राजेंद्र शाह ने कहा कि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने प्रदेश की जनता से सत्ता में आने के 100 दिन के भीतर लोकायुक्त की नियुक्ति करने का वादा किया था। लेकिन सरकार बनने के करीब नौ साल बाद भी यह वादा पूरा नहीं हो सका है।

राजेंद्र शाह ने आरोप लगाया कि सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ कथित जीरो टॉलरेंस की नीति सिर्फ दावों तक सीमित है। उनका कहना है कि यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर है तो लोकायुक्त जैसी संवैधानिक संस्था को लंबे समय तक खाली क्यों रखा गया?

कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि सरकार अपने मंत्रियों और करीबी अधिकारियों से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मामलों की स्वतंत्र जांच से बचना चाहती है। उन्होंने कहा कि लोकायुक्त की अनुपस्थिति से भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों की स्वतंत्र और प्रभावी जांच को लेकर सवाल खड़े होते हैं।

‘दफ्तर और ढांचे पर हर साल खर्च क्यों?’

कांग्रेस ने लोकायुक्त संस्था के प्रशासनिक ढांचे पर होने वाले सरकारी खर्च को लेकर भी सवाल उठाया है। राजेंद्र शाह ने कहा कि जब लोकायुक्त का पद ही लंबे समय से खाली है, तो संस्था के कार्यालय और अन्य व्यवस्थाओं पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च करने का औचित्य क्या है।

उन्होंने दावा किया कि लोकायुक्त कार्यालय और उसके ढांचे पर हर वर्ष करीब दो से तीन करोड़ रुपये का सरकारी बजट खर्च हो रहा है। कांग्रेस का सवाल है कि जब संस्था का मूल पद ही रिक्त है तो इस खर्च का प्रभावी उपयोग किस तरह हो रहा है।

हाईकोर्ट के रुख के बाद सर्च कमेटी का गठन?

कांग्रेस प्रदेश महामंत्री ने पांच सदस्यीय सर्च कमेटी के गठन को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। उनका आरोप है कि सरकार ने अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि उत्तराखंड हाईकोर्ट के कड़े रुख और फटकार के बाद लोकायुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है।

कांग्रेस का कहना है कि इतने लंबे समय तक नियुक्ति नहीं होना सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है। पार्टी ने मांग की है कि लोकायुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा किया जाए, ताकि भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों की स्वतंत्र जांच के लिए प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित हो सके।

भाजपा का पलटवार- ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ सीएम खुद कर रहे कार्रवाई’

कांग्रेस के आरोपों पर भाजपा ने भी पलटवार किया है। भाजपा प्रदेश प्रवक्ता कुंवर जपेंद्र सिंह ने माना कि लोकायुक्त की नियुक्ति में देरी हुई है, लेकिन उन्होंने कहा कि इसका मतलब यह नहीं है कि प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही।

उन्होंने कहा कि लोकायुक्त को भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस तरह की कार्रवाई करनी होती है, उसी दिशा में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार लगातार काम कर रही है। भाजपा प्रवक्ता के मुताबिक, मुख्यमंत्री के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के मामलों में लगातार कार्रवाई की गई है और ढाई सौ से अधिक लोगों को जेल भेजा जा चुका है।

‘चयन प्रक्रिया चल रही है’

भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि लोकायुक्त के चयन के लिए कमेटी का गठन किया जा चुका है और अब उचित व्यक्ति के चयन की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि सरकार भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ किसी भी स्तर पर समझौता नहीं कर रही है।

भाजपा का तर्क है कि लोकायुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया अपने स्तर पर चल रही है, जबकि भ्रष्टाचार के मामलों में सरकार और जांच एजेंसियां पहले से कार्रवाई कर रही हैं।

2027 से पहले मुद्दा बनने के संकेत

उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच लोकायुक्त की नियुक्ति का मुद्दा राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है। कांग्रेस इसे भाजपा के पुराने चुनावी वादे से जोड़कर सरकार को घेर रही है, जबकि भाजपा मुख्यमंत्री धामी की भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई को अपनी उपलब्धि के तौर पर सामने रख रही है।

ऐसे में अब निगाहें लोकायुक्त चयन की प्रक्रिया पर टिकी हैं। सवाल यह है कि करीब नौ वर्षों से खाली पड़े इस पद पर नियुक्ति कब तक होती है और क्या सरकार चुनाव से पहले इस मुद्दे को पूरी तरह शांत करने में सफल हो पाएगी?

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