जौनसार-बावर की स्वयं सहायता समूह की महिलाएं तैयार कर रही हैं लिंगुड़ा का अचार, पारंपरिक वन उपज को मिला नया बाजार और नई पहचान
विकासनगर। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से मिलने वाली पारंपरिक वन उपज लिंगुड़ा अब केवल मौसमी सब्जी नहीं रह गई है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता का मजबूत माध्यम बन रही है। जौनसार-बावर क्षेत्र की महिलाओं ने इस अनमोल प्राकृतिक उत्पाद को मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) के जरिए नया बाजार दिया है। स्वयं सहायता समूह की महिलाएं लिंगुड़ा का स्वादिष्ट अचार तैयार कर इसे उत्तराखंड से बाहर दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों तक पहुंचा रही हैं।
गाड़-गदेरों की अनमोल सौगात है लिंगुड़ा
लिंगुड़ा, जिसका वैज्ञानिक नाम Diplazium esculentum है, एक खाने योग्य जंगली फर्न है। यह गर्मियों और बरसात के मौसम में पहाड़ों के गाड़-गदेरों, झरनों और नम स्थानों पर प्राकृतिक रूप से उगता है। कोमल और गोल मुड़ी हुई इसकी नई कोंपलें स्वाद के साथ-साथ पोषक तत्वों से भी भरपूर होती हैं। स्थानीय लोग वर्षों से इसे सब्जी के रूप में उपयोग करते रहे हैं, लेकिन अब इसका व्यावसायिक उपयोग भी तेजी से बढ़ रहा है।
महिलाओं ने पारंपरिक उत्पाद को बनाया कारोबार
विकासनगर क्षेत्र के उदपाल्टा गांव में ‘जय मां दुर्गा स्वयं सहायता समूह’ से जुड़ी दस महिलाओं ने इस पारंपरिक वन उपज को आय का स्थायी स्रोत बना दिया है। समूह की महिलाएं जंगलों और गाड़-गदेरों से लिंगुड़ा एकत्र करने के साथ-साथ स्थानीय ग्रामीणों से भी इसकी खरीद करती हैं और फिर पारंपरिक मसालों से इसका अचार तैयार करती हैं।
इस पहल ने न केवल महिलाओं की आय बढ़ाई है, बल्कि एक सीमित अवधि तक उपलब्ध रहने वाली इस सब्जी को सालभर उपभोक्ताओं तक पहुंचाने का रास्ता भी खोल दिया है।
पिछले वर्ष 50 हजार रुपये से अधिक की बिक्री
समूह की अध्यक्ष निशा देवी के अनुसार, पिछले वर्ष महिलाओं ने लिंगुड़ा का अचार बेचकर 50 हजार रुपये से अधिक की आय अर्जित की थी। बढ़ती मांग को देखते हुए इस वर्ष समूह ने उत्पादन बढ़ाने का निर्णय लिया है और लगभग तीन क्विंटल अचार तैयार किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि एक किलोग्राम अचार की कीमत 400 रुपये निर्धारित की गई है और इसकी मांग उत्तराखंड के अलावा दिल्ली तथा हरियाणा जैसे राज्यों से भी मिल रही है।
ग्रामीणों से 70-80 रुपये किलो खरीदा जाता है लिंगुड़ा
समाजसेवी बच्चना शर्मा ने बताया कि स्वयं सहायता समूह की कुछ महिलाएं स्वयं लिंगुड़ा एकत्र करती हैं, जबकि अतिरिक्त आवश्यकता होने पर स्थानीय ग्रामीणों से 70 से 80 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से इसकी खरीद की जाती है।
अचार तैयार करने की प्रक्रिया में पहले लिंगुड़ा को अच्छी तरह साफ किया जाता है, फिर उसकी कटाई, उबालने और सुखाने के बाद स्थानीय मसालों के साथ पारंपरिक तरीके से अचार बनाया जाता है। इससे उत्पाद का स्वाद भी बना रहता है और उसकी गुणवत्ता भी बेहतर होती है।
सरकारी योजनाओं से मिल रही नई ताकत
बच्चना शर्मा का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार द्वारा स्वयं सहायता समूहों के लिए संचालित विभिन्न योजनाओं का लाभ महिलाओं को मिल रहा है। इन योजनाओं की मदद से ग्रामीण महिलाएं स्थानीय संसाधनों पर आधारित छोटे-छोटे उद्यम स्थापित कर आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं।
उन्होंने कहा कि भविष्य में क्षेत्र के अन्य महिला समूहों को भी लिंगुड़ा और अन्य पारंपरिक वन उत्पादों का मूल्य संवर्धन कर स्वरोजगार से जोड़ने के लिए प्रेरित किया जाएगा।
स्थानीय संसाधनों से आत्मनिर्भरता की मिसाल
जौनसार-बावर की महिलाओं की यह पहल इस बात का उदाहरण है कि यदि स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक और व्यावसायिक तरीके से उपयोग किया जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के नए अवसर सृजित किए जा सकते हैं। लिंगुड़ा का अचार आज न केवल पहाड़ के पारंपरिक स्वाद को नई पहचान दे रहा है, बल्कि महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की एक सफल कहानी भी लिख रहा है।