भागीरथी रिवर वैली अथॉरिटी को 26 वर्षों से नहीं मिला फंड, सरकार से जवाब तलब
नैनीताल/देहरादून। टिहरी बांध परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय और कानूनी प्रावधानों के कथित उल्लंघन का मामला अब उत्तराखंड हाईकोर्ट की चौखट तक पहुंच गया है। प्रतापनगर से कांग्रेस विधायक विक्रम सिंह नेगी द्वारा दायर जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है। मामला टिहरी बांध परियोजना की मंजूरी के समय निर्धारित की गई एक महत्वपूर्ण शर्त के अनुपालन से जुड़ा है।
याचिका में कहा गया है कि टिहरी बांध परियोजना को वर्ष 1990 में भारत सरकार द्वारा दी गई पर्यावरणीय और प्रशासनिक स्वीकृति के दौरान यह स्पष्ट शर्त रखी गई थी कि परियोजना के प्रभावों की निगरानी के लिए भागीरथी रिवर मैनेजमेंट अथॉरिटी का गठन किया जाएगा। इस संस्था का दायित्व बांध के कारण उत्पन्न होने वाले पर्यावरणीय, भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक प्रभावों का नियमित अध्ययन और मूल्यांकन करना था।
2005 में बना कानून, लेकिन अथॉरिटी आज भी संसाधनों से वंचित
याचिका के अनुसार उत्तराखंड राज्य गठन के बाद वर्ष 2005 में विधानसभा द्वारा एक विशेष अधिनियम पारित किया गया, जिसमें धारा-12 के तहत भागीरथी रिवर वैली अथॉरिटी को सरकार की ओर से वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने का स्पष्ट प्रावधान किया गया था। इसके बावजूद राज्य गठन के 26 वर्ष बाद भी इस संस्था को पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध नहीं कराए गए।
याचिकाकर्ता का कहना है कि धनराशि के अभाव में अथॉरिटी अपनी मूल जिम्मेदारियों का प्रभावी ढंग से निर्वहन नहीं कर पा रही है, जिससे बांध परियोजना के दीर्घकालिक प्रभावों की निगरानी व्यवस्था लगभग निष्क्रिय हो गई है।
राजस्व का 20 प्रतिशत देने का प्रावधान, लेकिन खर्च शून्य
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अभिजय नेगी ने न्यायालय को बताया कि संबंधित अधिनियम के अनुसार टिहरी बांध से प्राप्त होने वाले राजस्व का 20 प्रतिशत भाग भागीरथी रिवर वैली अथॉरिटी के संरक्षण, अध्ययन और सुधार कार्यों पर खर्च किया जाना चाहिए था। लेकिन अब तक इस मद में शून्य प्रतिशत धनराशि उपलब्ध कराई गई है।
उनका कहना है कि यदि अथॉरिटी को संसाधन नहीं मिलते हैं तो परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का स्वतंत्र मूल्यांकन संभव नहीं हो पाएगा, जो मूल स्वीकृति की भावना के विपरीत है।
शर्तों के उल्लंघन पर रुक सकता है बांध का संचालन
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि वर्ष 1990 में दी गई मंजूरी में यह स्पष्ट प्रावधान था कि यदि परियोजना की पर्यावरणीय या अन्य महत्वपूर्ण शर्तों का उल्लंघन होता है तो परियोजना के कार्यों को रोका भी जा सकता है। ऐसे में मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं बल्कि स्वीकृति की मूल शर्तों के अनुपालन से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है।
विधानसभा में भी उठा था मुद्दा
प्रतापनगर विधायक विक्रम सिंह नेगी इस मुद्दे को पहले भी विधानसभा में उठा चुके हैं। उन्होंने सरकार से पूछा था कि अथॉरिटी को निर्धारित वित्तीय सहायता क्यों नहीं दी जा रही है। उस समय ऊर्जा विभाग का प्रभार संभाल रहे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ओर से दिए गए उत्तर को लेकर भी याचिकाकर्ता ने असंतोष जताया था।
हाईकोर्ट ने मांगा जवाब
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने याचिकाकर्ता पक्ष की दलीलें सुनने के बाद राज्य सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। अदालत ने सरकार से जवाब दाखिल करने को कहा है तथा मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की है।
इस मामले ने टिहरी बांध परियोजना की निगरानी, पर्यावरणीय जवाबदेही और सरकारी प्रतिबद्धताओं को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सभी की निगाहें हाईकोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई और सरकार के जवाब पर टिकी हैं।