जंगलों में बढ़ती आग पर सख्त हाईकोर्ट, पर्यावरणविद से मांगे ठोस समाधान-अगले हफ्ते वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पेश होंगे सुझाव

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फायर सीजन के दौरान जंगलों में लगातार बढ़ रही आग की घटनाओं पर गंभीर रुख अपनाते हुए स्वतः संज्ञान वाली जनहित याचिका सहित कई अन्य याचिकाओं पर संयुक्त सुनवाई की। मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले पर असंतोष जताते हुए पर्यावरणविद प्रोफेसर अजय रावत को निर्देश दिया है कि वे वनों को आग से बचाने के लिए अपने सुझाव वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अगले शुक्रवार को कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करें।

कोर्ट ने 2021 से दिए दिशा-निर्देश, पर अमल नहीं

सुनवाई के दौरान न्यायमित्र मैनाली ने कोर्ट को अवगत कराया कि उच्च न्यायालय पिछले चार वर्षों से राज्य सरकार को जंगलों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट निर्देश जारी कर रहा है, लेकिन धरातल पर कोई ठोस बदलाव दिखाई नहीं देता। उन्होंने कहा कि अगर 2021 से अब तक आदेशों का समुचित पालन होता, तो वनाग्नि की घटनाओं में कमी आती।

कोर्ट ने माना कि राज्य सरकार की ओर से उठाए गए कदम केवल आदेशों के बाद हुए हैं, स्वयं कोई स्थायी रणनीति नहीं बनाई गई।

उच्च हिमालयी क्षेत्रों पर खतरे का संकेत

कोर्ट ने चिंता जताई कि जंगलों में आग से:

  • उच्च हिमालयी क्षेत्रों का तापमान बढ़ रहा है

  • बादल फटने की घटनाओं में वृद्धि हो रही है

  • जन-धन और पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है

खंडपीठ ने कहा कि हर वर्ष मार्गदर्शन देने के बावजूद स्थिति में सुधार न होना गंभीर चिंता का विषय है।

कोर्ट के सुझाव: जल संरक्षण से फायर रोकथाम

कोर्ट ने अपने सुझावों में कहा कि—

  • ऊपरी हिमालयी क्षेत्रों में खालें (पानी संचयन संरचनाएँ) बनाई जाएं

  • उपलब्ध जल स्रोतों का पानी इन खालों में संग्रहीत किया जाए

  • जहां पानी उपलब्ध नहीं है, वहां भी संरचनाएँ विकसित की जाएं

  • सभी खालों को आपस में जोड़ा जाए ताकि फायर सीजन में इन्हें अग्नि-रोधी लाइन की तरह उपयोग किया जा सके

न्यायमित्र का पक्ष: हेलीकॉप्टर से ज्यादा गांव-स्तरीय व्यवस्था कारगर

न्यायमित्र मैनाली ने कहा कि—

  • सरकार द्वारा हेलीकॉप्टर से आग बुझाने पर भारी खर्च हो रहा है

  • इसके बावजूद आग पूरी तरह नहीं बुझती

  • इसके स्थान पर गांव स्तर पर समितियाँ गठित की जाएं

  • नागरिकों में जागरूकता, प्रशिक्षण और जिम्मेदारी तय की जाए

उन्होंने बताया कि 2016 और 2017 में भी हाईकोर्ट विस्तृत गाइडलाइन जारी कर चुका है, लेकिन आज तक प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

पुनः सुनवाई के लिए मामला सूचीबद्ध

कोर्ट ने यह भी स्मरण कराया कि—

  • 2021 में मीडिया रिपोर्टों पर स्वतः संज्ञान लिया गया था

  • राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने भी मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजकर हस्तक्षेप की मांग की थी

  • पिछले आदेशों का उचित अनुपालन न होने पर अब मामला पुनः सूचीबद्ध किया गया है

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