सेब उत्पादन में कश्मीर और हिमाचल को टक्कर देने की तैयारी में उत्तराखंड, 2030-31 तक 5 हजार हेक्टेयर में विकसित होंगे बाग

एप्पल मिशन के तहत पहाड़ों में हाई डेंसिटी सेब की खेती को मिलेगा बढ़ावा, उत्तरकाशी के साथ पिथौरागढ़, चमोली, रुद्रप्रयाग और अन्य जिलों में भी होगा विस्तार

देहरादून। उत्तराखंड की पहचान अब तक देवभूमि, पर्यटन और प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ पारंपरिक खेती के लिए रही है, लेकिन आने वाले वर्षों में राज्य सेब उत्पादन के क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाने की तैयारी कर रहा है। जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के बाद अब उत्तराखंड भी देश के सेब बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। राज्य सरकार ने वर्ष 2030-31 तक प्रदेश में 5 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सेब के बाग विकसित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके लिए एप्पल मिशन के तहत हाई डेंसिटी सेब उत्पादन को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

सरकार की इस योजना का उद्देश्य केवल पारंपरिक सेब उत्पादक क्षेत्र उत्तरकाशी तक ही खेती को सीमित रखना नहीं है, बल्कि प्रदेश के अन्य पर्वतीय जिलों में भी सेब उत्पादन की संभावनाओं को विकसित करना है। पिथौरागढ़, चमोली, रुद्रप्रयाग, चंपावत, बागेश्वर और टिहरी जैसे जिलों में जलवायु एवं भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप सेब की खेती को विस्तार देने की तैयारी है। इससे पहाड़ों में किसानों के लिए आय के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है।

जम्मू-कश्मीर और हिमाचल का सेब बाजार में दबदबा

देश में सेब उत्पादन की बात करें तो जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश लंबे समय से प्रमुख उत्पादक राज्य रहे हैं। इन दोनों राज्यों ने अपनी जलवायु, उन्नत बागवानी तकनीक और बेहतर बाजार व्यवस्था के दम पर राष्ट्रीय सेब बाजार में मजबूत स्थान बनाया है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद से संबद्ध आईएएसआरआई की वर्ष 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024-25 में जम्मू-कश्मीर में लगभग 20.45 लाख मीट्रिक टन सेब का उत्पादन हुआ। वहीं हिमाचल प्रदेश में करीब 5.83 लाख मीट्रिक टन सेब पैदा हुआ। इसके मुकाबले उत्तराखंड का उत्पादन लगभग 43.69 हजार मीट्रिक टन दर्ज किया गया।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि उत्तराखंड को सेब उत्पादन के मामले में अभी लंबा सफर तय करना है। हालांकि प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियां इस दिशा में नई संभावनाएं पैदा करती हैं।

2030-31 तक 5 हजार हेक्टेयर में विकसित होंगे सेब के बाग

राज्य सरकार ने एप्पल मिशन के तहत वर्ष 2030-31 तक 5 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सेब के बाग विकसित करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए हाई डेंसिटी प्लांटेशन यानी सघन बागवानी तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस तकनीक के माध्यम से सीमित भूमि में अधिक पौधे लगाकर उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने का प्रयास किया जाता है।

हालांकि निर्धारित लक्ष्य के मुकाबले योजना की शुरुआती प्रगति अपेक्षा से कम रही है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार, अब तक करीब 1,100 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तार होना था, जबकि वास्तविक उपलब्धि लगभग 700 हेक्टेयर तक ही पहुंच पाई है। ऐसे में 5 हजार हेक्टेयर के लक्ष्य को निर्धारित समय में हासिल करना विभाग के सामने बड़ी चुनौती है।

कृषि विभाग के सचिव एसएन पांडे के अनुसार, एप्पल मिशन फिलहाल लक्ष्य से कुछ पीछे चल रहा है। आने वाले दिनों में योजना में तेजी लाकर निर्धारित समय पर लक्ष्य पूरा करने का प्रयास किया जाएगा।

उत्तरकाशी के साथ दूसरे जिलों में भी बढ़ेगा सेब उत्पादन

उत्तराखंड में फिलहाल उत्तरकाशी जिला सेब उत्पादन के प्रमुख केंद्र के रूप में जाना जाता है। यहां की जलवायु सेब की खेती के अनुकूल है और हिमाचल प्रदेश से भौगोलिक निकटता के कारण वहां की बागवानी तकनीक का भी लाभ मिलता रहा है।

अब सरकार की योजना इस अनुभव को प्रदेश के दूसरे पर्वतीय जिलों तक पहुंचाने की है। पिथौरागढ़, चमोली और रुद्रप्रयाग के साथ चंपावत, बागेश्वर और टिहरी में भी सेब उत्पादन की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। इसके लिए किसानों को गुणवत्तायुक्त पौधे, तकनीकी जानकारी और विशेषज्ञों का मार्गदर्शन उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है।

इस पहल से उन किसानों को भी बागवानी से जोड़ने का प्रयास होगा, जो अभी तक पारंपरिक खेती पर निर्भर हैं। सेब उत्पादन के विस्तार से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलने के साथ ही पर्वतीय क्षेत्रों में स्वरोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।

सेब के साथ कीवी और ड्रैगन फ्रूट पर भी जोर

प्रदेश में बागवानी को बढ़ावा देने की योजना केवल सेब तक सीमित नहीं है। सरकार की ओर से कीवी और ड्रैगन फ्रूट जैसी उच्च मूल्य वाली फल फसलों को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इन फसलों के उत्पादन का दायरा बढ़ाने की तैयारी है।

दरअसल, पहाड़ों में खेती योग्य भूमि सीमित होने के साथ उत्पादन लागत, जंगली जानवरों से फसलों को नुकसान और बाजार तक उत्पाद पहुंचाने जैसी समस्याएं लंबे समय से बनी हुई हैं। ऐसे में पारंपरिक खेती के साथ उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों को अपनाना किसानों की आमदनी बढ़ाने का एक विकल्प बन सकता है।

केवल पौधे लगाने से नहीं बनेगी बात, बाजार तक पहुंचाना भी जरूरी

एप्पल मिशन की सफलता के लिए केवल बाग विकसित करना पर्याप्त नहीं होगा। किसानों को बेहतर उत्पादन के साथ बाजार में उचित कीमत दिलाना भी जरूरी है। इसके लिए पौधों की गुणवत्ता, किस्मों का चयन, सिंचाई, कटाई-छंटाई, रोग नियंत्रण और समय पर तुड़ाई जैसी तकनीकों पर विशेष ध्यान देना होगा।

इसके अलावा सेब की ग्रेडिंग, पैकेजिंग, भंडारण और परिवहन की बेहतर व्यवस्था भी विकसित करनी होगी। यदि किसानों को उत्पादन के बाद उचित बाजार और मूल्य मिल सके, तभी इस मिशन का वास्तविक लाभ ग्रामीण अर्थव्यवस्था तक पहुंचेगा।

किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत करने की जरूरत

पर्वतीय कृषक कृषि बागवानी और उद्यमी संगठन के महासचिव दीपक करगेती का कहना है कि उत्तरकाशी में सेब उत्पादन के पीछे अनुकूल जलवायु के साथ हिमाचल प्रदेश से मिलने वाली तकनीकी जानकारी की भी अहम भूमिका है। इसी तरह के प्रयास प्रदेश के दूसरे जिलों में भी किए जाने चाहिए।

उनके अनुसार, अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़ और चमोली जैसे क्षेत्रों में भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप सेब उत्पादन को प्रोत्साहित किया जा सकता है। उन्होंने एप्पल मिशन में कुछ संशोधन की जरूरत बताते हुए कहा कि किसानों को एकमुश्त आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि वे बागवानी के लिए जरूरी संसाधन जुटाकर आर्थिक रूप से मजबूत हो सकें।

उत्तराखंड के लिए बड़ी संभावना, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं

उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ी चुनौती जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के स्थापित सेब बाजार में अपनी पहचान बनाना है। इसके लिए उत्पादन बढ़ाने के साथ सेब की गुणवत्ता, स्वाद, उत्पादकता और बाजार की मांग के अनुरूप किस्मों पर ध्यान देना होगा।

यदि सरकार की योजना के अनुरूप किसानों को तकनीकी और आर्थिक सहायता मिलती है तथा भंडारण एवं विपणन की सुविधाएं विकसित होती हैं, तो उत्तराखंड का सेब उत्पादन आने वाले वर्षों में नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है। एप्पल मिशन का 5 हजार हेक्टेयर का लक्ष्य इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

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