चार्जशीट को दुर्भावनापूर्ण बताकर रद्द करने की मांग पर अदालत ने नहीं किया हस्तक्षेप, एसएसबी महानिदेशक को तीन सप्ताह में अनुशासनात्मक कार्रवाई पूरी करने के निर्देश
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) के रानीखेत स्थित कार्यालय में तैनात डिप्टी कमांडेंट (कम्युनिकेशन) हरीश चंद्र सिंह बिष्ट की पदोन्नति से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि कमांडेंट (कम्युनिकेशन) के पद पर वर्ष 2027 की रिक्ति के लिए चल रही चयन प्रक्रिया में याचिकाकर्ता के दावे पर भी विचार किया जाए, लेकिन उनका चयन परिणाम सीलबंद लिफाफे में रखा जाए। इस दौरान संबंधित रिक्ति पर किसी अन्य अधिकारी को पदोन्नति नहीं दी जाएगी।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए एसएसबी के महानिदेशक को 30 जून 2025 को जारी चार्जशीट से संबंधित अनुशासनात्मक कार्रवाई पूरी करने और आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तिथि से तीन सप्ताह के भीतर कानून के अनुसार अंतिम आदेश पारित करने के निर्देश दिए।
चार्जशीट और रिकॉर्ड ऑफ एविडेंस के आदेश को दी थी चुनौती
याचिकाकर्ता हरीश चंद्र सिंह बिष्ट ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर 30 जून 2025 को एसएसबी के महानिरीक्षक, फ्रंटियर मुख्यालय रानीखेत की ओर से जारी चार्जशीट और 11 जुलाई 2025 को उनके खिलाफ ‘रिकॉर्ड ऑफ एविडेंस’ तैयार करने के लिए जारी आदेश को रद्द करने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता का आरोप था कि कमांडेंट (कम्युनिकेशन) के पद पर उनकी पदोन्नति का समय आने पर उन्हें रोकने के उद्देश्य से प्रेरित और झूठी चार्जशीट जारी की गई। उन्होंने आशंका जताई कि इस कार्रवाई के जरिए उनकी पदोन्नति और करियर प्रगति को प्रभावित करने का प्रयास किया गया।
उन्होंने अदालत से यह निर्देश देने का भी अनुरोध किया था कि संबंधित अधिकारी चार्जशीट के आधार पर उनकी पदोन्नति या करियर प्रगति पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न डालें।
चार्जशीट रद्द करने की मांग पर अदालत ने क्यों नहीं किया हस्तक्षेप?
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सामान्यतः किसी चार्जशीट को अदालत में चुनौती देने का आधार सीमित होता है। इसमें विशेष रूप से यह देखा जा सकता है कि चार्जशीट जारी करने वाला अधिकारी सक्षम था या नहीं। इस मामले में याचिकाकर्ता ने चार्जशीट जारी करने वाले अधिकारी की वैधानिक सक्षमता पर सवाल नहीं उठाया था।
इसी आधार पर अदालत ने चार्जशीट के पीछे दुर्भावना होने के आरोप पर विचार करने से इनकार कर दिया। हालांकि, पदोन्नति से जुड़े विवाद और लंबित अनुशासनात्मक कार्रवाई को देखते हुए अदालत ने संबंधित प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के निर्देश दिए।
तीन सप्ताह में कार्रवाई पूरी करने के निर्देश
हाईकोर्ट ने एसएसबी के महानिदेशक को निर्देश दिया कि 30 जून 2025 की चार्जशीट के संबंध में चल रही अनुशासनात्मक कार्रवाई को पूरा कर तीन सप्ताह के भीतर कानून के अनुसार अंतिम आदेश पारित किया जाए। यह अवधि अदालत के आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तिथि से गिनी जाएगी।
अदालत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई अनिश्चितकाल तक लंबित न रहे और पदोन्नति से संबंधित निर्णय निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिया जा सके।
पदोन्नति प्रक्रिया में शामिल होंगे याचिकाकर्ता, परिणाम सीलबंद रहेगा
अदालत ने स्पष्ट किया कि तीन सप्ताह की निर्धारित अवधि के दौरान अथवा एसएसबी महानिदेशक की ओर से अंतिम आदेश पारित होने तक वर्ष 2027 की रिक्ति के लिए कमांडेंट (कम्युनिकेशन) के पद पर किसी अन्य अधिकारी को पदोन्नति नहीं दी जाएगी।
चूंकि हरीश चंद्र सिंह बिष्ट सबसे वरिष्ठ डिप्टी कमांडेंट (कम्युनिकेशन) हैं, इसलिए चल रही चयन प्रक्रिया में उनके दावे पर भी विचार किया जाएगा। हालांकि, उनका परिणाम सीलबंद लिफाफे में रखा जाएगा।
अदालत के आदेश के अनुसार, यदि याचिकाकर्ता 30 जून 2025 की चार्जशीट से शुरू हुई अनुशासनात्मक कार्रवाई में पूरी तरह दोषमुक्त हो जाते हैं, तो सीलबंद लिफाफे में रखे उनके परिणाम को खोला जाएगा।
इस आदेश से पदोन्नति के मामले में याचिकाकर्ता का दावा चयन प्रक्रिया में विचार के लिए सुरक्षित रहेगा, जबकि उनके खिलाफ लंबित अनुशासनात्मक कार्रवाई का अंतिम परिणाम भी पदोन्नति संबंधी निर्णय में महत्वपूर्ण बना रहेगा।