विजय दिवस: 1971 के युद्ध में उत्तराखंड के वीरों ने दिखाया पराक्रम, पाकिस्तान को झुकना पड़ा

वीरों की भूमि उत्तराखंड के जांबाजों ने रचा इतिहास, आज भी गर्व से याद किया जाता है शौर्य

देहरादून। 16 दिसंबर—विजय दिवस भारत के सैन्य इतिहास का वह स्वर्णिम दिन है, जब 1971 के भारत-पाक युद्ध में भारतीय सेना के शौर्य के आगे पाकिस्तान को घुटने टेकने पड़े थे। इस ऐतिहासिक जीत में उत्तराखंड के वीर सपूतों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। प्रदेश के सैकड़ों जवानों ने रणभूमि में अदम्य साहस दिखाते हुए दुश्मन को करारी शिकस्त दी।

उत्तराखंड को यूं ही वीरों की भूमि नहीं कहा जाता। 1971 के युद्ध में यहां के कई जांबाज सैनिकों ने अपनी बहादुरी से इतिहास रच दिया और देश की अखंडता की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान तक दिया।


आज ही के दिन पाकिस्तानी रेजिमेंट ने किया था आत्मसमर्पण

मूल रूप से लैंसडाउन और वर्तमान में नवादा निवासी शौर्य चक्र विजेता लेफ्टिनेंट कर्नल (सेनि.) राकेश चंद्र कुकरेती (79 वर्ष) बताते हैं कि 16 दिसंबर 1971 को उनकी 6 राजपूताना रेजिमेंट के समक्ष पाकिस्तान की 22 बलूच रेजिमेंट ने आत्मसमर्पण किया था।

उन्होंने बताया कि रेजिमेंट ज्वाइन करने के कुछ समय बाद ही उनकी यूनिट धर्मनगर से बांग्लादेश के सिलहट क्षेत्र के लिए रवाना हुई थी, जहां भीषण संघर्ष के बाद दुश्मन सेना को पीछे हटना पड़ा।

एक परिवार, चार भाई—चारों युद्ध में शामिल

लेफ्टिनेंट कर्नल कुकरेती का परिवार भी देशसेवा की मिसाल है। उनके चारों भाई—

  • मेजर जनरल प्रेम लाल कुकरेती

  • मेजर धर्मपाल कुकरेती

  • मेजर जगदीश कुकरेती

  • नायब सूबेदार सोहन लाल कुकरेती

भी 1971 के भारत-पाक युद्ध में शामिल रहे। यह उत्तराखंड की सैन्य परंपरा और राष्ट्रभक्ति का अनूठा उदाहरण है।


ढाका में हुआ था ऐतिहासिक आत्मसमर्पण

मूल रूप से हवालबाग (अल्मोड़ा) और वर्तमान में सेलाकुई निवासी मेजर नारायण सिंह पिलखवाल (97 वर्ष) बताते हैं कि वे उस समय 251 पैरा मेडिकल कंपनी में तैनात थे। उनके अनुसार—

13 दिन चले युद्ध के बाद 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान की पूर्वी कमान ने ढाका में आत्मसमर्पण किया था। इस दौरान 90 हजार से अधिक पाकिस्तानी सैनिक युद्धबंदी बनाए गए, जो विश्व इतिहास में एक बड़ी सैन्य घटना थी।


वीरों की विरासत आगे बढ़ा रहे बेटे

1971 के युद्ध में शामिल रहे उत्तराखंड के वीरों ने न केवल स्वयं देश की रक्षा की, बल्कि अपनी अगली पीढ़ी को भी सेना में भेजकर राष्ट्रसेवा की परंपरा को आगे बढ़ाया।

  • लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश चंद्र कुकरेती के जुड़वां बेटे कार्तिकेय और अर्थ कुकरेती वर्तमान में भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल हैं।

  • मेजर नारायण सिंह पिलखवाल के पुत्र भगवंत सिंह पिलखवाल सेना से कर्नल पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं।

यह साबित करता है कि उत्तराखंड में देशभक्ति पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित होती रही है।


1971 युद्ध में उत्तराखंड के 248 वीरों ने दी शहादत

1971 के भारत-पाक युद्ध में उत्तराखंड के 248 वीर सैनिकों ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। जिलेवार आंकड़े इस प्रकार हैं— अल्मोड़ा – 23 बागेश्वर – 24 चंपावत – 8 चमोली – 31 देहरादून – 42 लैंसडाउन – 17 नैनीताल – 11 पौड़ी – 16 पिथौरागढ़ – 48 रुद्रप्रयाग – 1 टिहरी – 9 ऊधमसिंह नगर – 6 उत्तरकाशी – 1

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