उत्तराखंड में भू-माफियाओं का बेलगाम राज, किसान की आत्महत्या से उजागर हुआ प्रशासनिक संरक्षण का खेल

उत्तराखंड में भू-माफियाओं का आतंक लगातार गहराता जा रहा है। सरकारी और गैर-सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे, किसानों और आम नागरिकों को डराना-धमकाना तथा प्रशासनिक मिलीभगत के आरोप अब आम होते जा रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि तमाम दावों और कार्रवाइयों के बावजूद राज्य सरकार और प्रशासन भू-माफियाओं पर प्रभावी अंकुश लगाने में अब तक असफल नजर आ रहे हैं।

पूर्व में भू-माफियाओं पर शिकंजा कसने के उद्देश्य से पुलिस प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों द्वारा एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया था, लेकिन बाद में यह बात सामने आई कि राज्य में सक्रिय भू-माफियाओं की इस एसआईटी में भी कथित तौर पर घुसपैठ हो गई। हालात इतने गंभीर हो गए कि अंततः एसआईटी को भंग करना पड़ा। इस घटनाक्रम ने साफ संकेत दे दिए कि भू-माफिया केवल जमीनों पर ही नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर भी अपनी जड़ें मजबूत कर चुके हैं।

भू-माफियाओं के बढ़ते आतंक की भयावह तस्वीर हाल ही में तब सामने आई, जब काशीपुर के एक किसान ने नैनीताल के गौलापार क्षेत्र में आत्महत्या कर ली। किसान ने आत्महत्या से पहले एक वीडियो जारी कर भू-माफियाओं के साथ-साथ स्थानीय पुलिस प्रशासन पर भी गंभीर आरोप लगाए थे। वीडियो में उसने खुलासा किया था कि किस तरह उसे लगातार प्रताड़ित किया जा रहा था और उसकी शिकायतों पर कोई सुनवाई नहीं हो रही थी।

इस हृदयविदारक घटना के बाद शासन-प्रशासन की नींद टूटी और कुमाऊं आयुक्त की निगरानी में एक जांच समिति का गठन किया गया। समिति अब उन पुलिस अधिकारियों के बयान दर्ज कर रही है, जिनके नाम मृतक किसान ने अपने वीडियो में लिए थे। हालांकि सवाल यह उठता है कि यदि समय रहते कार्रवाई होती, तो क्या एक किसान की जान बचाई जा सकती थी?

राज्य में ऐसे मामले कोई एक-दो नहीं हैं। राजधानी देहरादून की बात करें तो यहां भी सफेदपोशों के संरक्षण में भू-माफियाओं द्वारा बड़े पैमाने पर सरकारी और निजी जमीनों पर कब्जा किए जाने के आरोप लगातार सामने आते रहे हैं। पछुवादून से लेकर परवादून तक कई इलाके ऐसे हैं, जहां जमीनों पर अवैध कब्जे को लेकर स्थानीय लोग लंबे समय से आवाज उठा रहे हैं, लेकिन ठोस कार्रवाई का अभाव साफ नजर आता है।

बीते वर्ष नालापानी क्षेत्र में जंगल के बीचोबीच कब्जा करने की कोशिश ने प्रशासन की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया था। जब भू-माफियाओं ने जंगल भूमि पर कब्जा करने का प्रयास किया, तो क्षेत्रीय जनता भड़क उठी और व्यापक विरोध प्रदर्शन किया। जनआक्रोश बढ़ने के बाद ही प्रशासन हरकत में आया और कब्जा हटाया गया। यह घटना बताती है कि कई मामलों में प्रशासन तब तक सक्रिय नहीं होता, जब तक जनता सड़कों पर न उतर आए।

ऐसे हालात में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राज्य सरकार वास्तव में भू-माफियाओं पर लगाम लगाने के लिए गंभीर है? या फिर भू-माफिया यूं ही सरकारी और गैर-सरकारी जमीनों पर कब्जा करते रहेंगे और आम नागरिक, किसान तथा गरीब वर्ग इसकी कीमत चुकाता रहेगा?

अब जरूरत इस बात की है कि सरकार

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