संविधान पर गर्व, सत्ता की मनमानी पर सवाल – नेपाल से भारत को मिली बड़ी सीख

नई दिल्ली/देहरादून:
“सिंहासन खाली करो जनता आती है” – यह कहावत इन दिनों दक्षिण एशिया की राजनीति में सच साबित होती दिख रही है। चाहे कोई राजा हो, महाराजा, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति – उसका ओहदा और अस्तित्व केवल जनता की स्वीकृति और विश्वास पर टिका होता है। जब जनता का भरोसा टूटता है, तब सबसे मज़बूत दिखने वाली सत्ता भी चंद मिनटों में ढह जाती है। नेपाल इसके ताज़ा उदाहरण के रूप में दुनिया के सामने है।

सुप्रीम कोर्ट की गंभीर टिप्पणी

भारत के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस वी. आर. गवई ने कर्नाटक सरकार की अपील पर सुनवाई के दौरान कहा –
“हमें अपने संविधान पर गर्व है, ज़रा नेपाल की ओर देखिए।”
यह टिप्पणी केवल पड़ोसी मुल्क की हालिया घटनाओं पर संकेत नहीं थी, बल्कि भारत की राजनीति और सत्ता के चरित्र को आईना दिखाने वाली भी थी।

सुप्रीम कोर्ट में इस समय राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा विधेयकों को रोके जाने का मुद्दा विचाराधीन है। अदालत ने पहले ही तय कर दिया है कि राष्ट्रपति और राज्यपालों को किसी भी सरकार द्वारा पारित विधेयकों पर निर्णय के लिए समय सीमा में बंधना होगा। लेकिन हाल ही में राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर अपने अधिकारों की व्याख्या मांगने से बहस और गहरी हो गई है।

सत्ता बनाम संविधान – बड़ा सवाल

सीजेआई गवई की टिप्पणी का सीधा संकेत उन नेताओं की ओर था जो सत्ता में बने रहने के लिए संविधान से छेड़छाड़ करना चाहते हैं। हाल ही में लोकसभा चुनावों के दौरान संविधान बदलने का मुद्दा चर्चा के केंद्र में रहा। संवैधानिक संस्थाओं को अपने अनुकूल बनाने या उनकी स्वायत्तता को कमज़ोर करने की कोशिशें भी सामने आती रही हैं।

नेपाल में भी यही हुआ – जब वहां के वयोवृद्ध प्रधानमंत्री ने सत्ता में बने रहने के लिए संवैधानिक प्रावधानों से छेड़छाड़ की। नतीजा यह हुआ कि जनता सड़क पर उतरी और संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक घेराव कर दिया।

भारत के लिए चेतावनी

भारतीय सुप्रीम कोर्ट का यह इशारा साफ है कि अगर सत्ता संविधान सम्मत आचरण नहीं करेगी, तो उसके परिणाम नेपाल जैसे ही होंगे। लोकतंत्र में सरकार की ताकत जनता और संविधान से आती है। जब जनता सत्ता की मनमानी से ऊब जाती है, तो बदलाव अवश्यंभावी हो जाता है।

संघ प्रमुख का बयान और नई सियासी सुगबुगाहट

इसी बीच आरएसएस प्रमुख का एक अहम बयान भी सामने आया है। उन्होंने सत्ता का दुरुपयोग न करने और 75 साल की उम्र के बाद कुर्सी युवाओं को सौंपने की नसीहत दी। यह बयान उपराष्ट्रपति चुनाव के तुरंत बाद आया है।
इसके बाद दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संभावित इस्तीफे की चर्चाएं और तेज हो गई हैं। वह इस्तीफा देते हैं या नहीं, लेकिन यह साफ है कि देश की राजनीति बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रही है।

नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों के हालात भारत के लिए चेतावनी हैं। सत्ता और संवैधानिक संस्थाओं के बीच टकराव लोकतंत्र को अस्थिर बना सकता है। इसलिए आज समय की सबसे बड़ी ज़रूरत यही है कि –

 

  • संविधान की गरिमा बनी रहे,

  • संस्थाओं की स्वायत्तता बरकरार रहे,

  • और सत्ता जनता के विश्वास का सम्मान करे।

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