“योजना कागज़ पर, बच्चे हाशिये पर” उत्तराखंड में ट्रांसजेंडर बच्चों के समावेशन पर सिस्टम की बड़ी खामियां उजागर
देहरादून। उत्तराखंड में ट्रांसजेंडर बच्चों के अधिकार, संरक्षण और समावेशन को लेकर हुई उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक ने कई चौंकाने वाली सच्चाइयाँ सामने रख दी हैं। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की बैठक में यह स्पष्ट हुआ कि सरकार की योजनाएँ मौजूद हैं, लेकिन ज़मीन पर उनका असर लगभग शून्य है — खासकर शिक्षा, पहचान, स्वास्थ्य और छात्रवृत्ति के मोर्चे पर।
बैठक में विभिन्न विभागों के अधिकारियों, सामाजिक संगठनों और ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। चर्चा का केंद्र था — ट्रांसजेंडर बच्चों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की वास्तविक स्थिति।
छात्रवृत्ति योजना — लाभार्थी शून्य
समाज कल्याण विभाग द्वारा कक्षा 9 और 10 के ट्रांसजेंडर छात्रों के लिए ₹13,500 वार्षिक छात्रवृत्ति की योजना संचालित है, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि अब तक एक भी बच्चे ने इस योजना का लाभ नहीं लिया।
कारण सामने आए:
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योजना की जानकारी का अभाव
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पंजीकरण और दस्तावेजीकरण की जटिल प्रक्रिया
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सामाजिक पहचान उजागर होने का डर
यह स्थिति दर्शाती है कि योजना का ढांचा है, लेकिन पहुँच तंत्र कमजोर है।
जन्म से संघर्ष: मानसिक यातना और सामाजिक बहिष्कार
आयोग अध्यक्ष गीता खन्ना ने कहा कि ट्रांसजेंडर बच्चे बचपन से ही तानों, भेदभाव और मानसिक उत्पीड़न का सामना करते हैं।
उन्होंने जिन प्रमुख चुनौतियों को रेखांकित किया, वे हैं:
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पहचान पत्र व दस्तावेज़ बनवाने में कठिनाई
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शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच
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पारिवारिक अस्वीकार्यता और परित्याग
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संस्थागत देखभाल की कमी
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उत्पीड़न और हिंसा का खतरा
उन्होंने स्पष्ट कहा कि इन बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है।
जमीनी सच्चाई: कानून हैं, व्यवस्था तैयार नहीं
ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रतिनिधि ओशीन और अदिति ने बताया कि ट्रांसजेंडर पर्सन्स (Protection of Rights) Act, 2019 लागू होने के बावजूद कई स्कूल-कॉलेजों में:
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प्रवेश फॉर्म में “ट्रांसजेंडर” विकल्प नहीं
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आईडी कार्ड में जेंडर पहचान बदलने की सुविधा नहीं
इस कारण बच्चों को मजबूरन पुरुष या महिला श्रेणी में नामांकन करना पड़ता है।
आंकड़ों में असमानता
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राज्य में अनुमानित करीब 1000 ट्रांसजेंडर
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पिछले 6 वर्षों में प्रमाणित केवल 76
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यू-डाईस पोर्टल पर पंजीकृत ट्रांसजेंडर छात्र: सिर्फ 3
यह दर्शाता है कि पहचान छुपाने का दबाव और सामाजिक असुरक्षा सबसे बड़ी बाधा है।
ट्रांसजेंडर बच्चों के लिए सुरक्षित गृह का अभाव
जहां कुछ राज्यों में ट्रांसजेंडर वयस्कों के लिए गरिमा गृह संचालित हैं, वहीं उत्तराखंड में ट्रांसजेंडर बच्चों के लिए कोई सुरक्षित आश्रय गृह उपलब्ध नहीं।
आयोग ने बाल विकास विभाग और समाज कल्याण विभाग को मिलकर ‘फिट फैसिलिटी’ (सुरक्षित गृह) विकसित करने के निर्देश दिए।
स्वास्थ्य सेवाओं में पहल: AIIMS ऋषिकेश आगे
एम्स ऋषिकेश के चिकित्सकों ने जानकारी दी कि:
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ट्रांसजेंडर बच्चों व अभिभावकों के लिए काउंसलिंग
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हार्मोन थेरेपी
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सर्जिकल सुविधाएँ उपलब्ध
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अलग ट्रांसजेंडर क्लीनिक स्थापित करने की प्रक्रिया जारी