उत्तराखंड में कहर बनकर टूटा मानसून: टूटी सड़कें, थमी ज़िंदगी, कब भरेंगे आपदा के घाव?

देहरादून। उत्तराखंड एक बार फिर प्राकृतिक आपदाओं के चपेट में आ गया है, और इस बार इसका असर और भी गहरा, व्यापक और भयावह दिख रहा है। मानसून की बेरहम बारिश ने राज्य के पहाड़ी जिलों को तहस-नहस कर दिया है। लगातार हो रही मूसलाधार बारिश, भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं ने जीवन की रफ्तार थाम दी है।

धराली क्षेत्र, जहां बीस दिन पहले आपदा ने भारी तबाही मचाई थी, वहां अब तक हालात सामान्य नहीं हो पाए हैं। प्रभावित इलाकों में न तो सड़कें खुली हैं, न ही जरूरी राहत सामग्री ठीक से पहुंच पाई है। ग्रामीण इलाकों में आम जरूरत की वस्तुओं की भारी किल्लत है। कुछ गांवों का तो अब भी मुख्य सड़कों और प्रशासनिक मुख्यालय से संपर्क कटा हुआ है।

धराली आपदा से उबरे भी नहीं थे कि दो दिन पहले चमोली जिले के थराली में बादल फटने से नया संकट खड़ा हो गया। मलवे से पटे गांवों में जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त है। दो से तीन फीट तक जमा मलबा न केवल घरों के भीतर घुस आया है, बल्कि रास्तों को भी अवरुद्ध कर चुका है।

सरकारी दावे किए जा रहे हैं कि राहत कार्य जारी हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है। आपदा प्रभावित क्षेत्रों में न बिजली है, न पानी, और न ही यातायात की कोई सुविधा। गंगोत्री हाईवे, जो राज्य के लिए महत्वपूर्ण लाइफलाइन मानी जाती है, अब तक सुचारू नहीं हो पाया है। वहीं, यमुनोत्री हाईवे भी भूस्खलन के कारण पूरी तरह ठप हो चुका है।

ताजा जानकारी के अनुसार, नालूना के पास एक नया भूस्खलन जोन सक्रिय हो गया है। पूरी पहाड़ी सड़क पर गिरने से यह मार्ग पूरी तरह बंद हो गया है। इससे स्थिति और भयावह हो गई है।

उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चमोली जिलों की कुल 60 से अधिक सड़कें बंद पड़ी हैं। यह आंकड़ा अपने आप में इस बात का संकेत है कि यदि इन इलाकों में किसी भी तरह की बड़ी आपदा और घटती है, तो राहत पहुंचाना नामुमकिन नहीं तो बेहद मुश्किल जरूर होगा।

राज्य सरकार और आपदा प्रबंधन विभाग की कोशिशें जारी हैं, लेकिन लगातार हो रही बारिश उनके प्रयासों को भी सीमित कर रही है। मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि आने वाले कम से कम सात दिन तक बारिश का कहर जारी रहेगा। देहरादून सहित छह जिलों में रेड अलर्ट जारी किया गया है। नदियों का जलस्तर खतरे के निशान को पार कर चुका है, नाले उफान पर हैं और लोगों को चेतावनी दी जा रही है कि वे नदी-नालों से दूर रहें।

वर्तमान परिस्थिति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इन आपदाओं के घाव कब भरेंगे? क्या राज्य सरकार और प्रशासन के पास इसके लिए कोई दीर्घकालिक योजना है? आपदा के समय राहत से कहीं ज्यादा जरूरी है पूर्व तैयारी और ढांचागत मजबूती, जिससे जनहानि और आर्थिक नुकसान को कम किया जा सके।

फिलहाल, उत्तराखंड के लाखों लोगों की आंखें आसमान पर टिकी हैं—जहां से बारिश के रुकने की उम्मीद है, और जमीन पर टिकी हैं—जहां वे मदद का हाथ ढूंढ़ रहे हैं।

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