हरिद्वार सिविल जज प्रकरण में हाईकोर्ट का अहम फैसला, 4 साल बाद बहाल हुईं दीपाली शर्मा

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में हरिद्वार की बर्खास्त सिविल जज (सीनियर डिवीजन) दीपाली शर्मा को बड़ी राहत देते हुए उनकी बर्खास्तगी को निरस्त कर दिया है। हाईकोर्ट ने न केवल उन्हें सेवा में बहाल करने के आदेश दिए हैं, बल्कि बर्खास्तगी की तिथि से निरंतर सेवा मानते हुए वरिष्ठता सहित सभी सेवा लाभ प्रदान करने के भी निर्देश दिए हैं।

मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने इस प्रकरण में विस्तृत सुनवाई के बाद 6 जनवरी को बहाली का आदेश पारित किया था, जिसकी प्रति शुक्रवार को प्राप्त हुई।

2008 में हुई थी नियुक्ति

दीपाली शर्मा की नियुक्ति वर्ष 2008 में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर हुई थी। बाद में वे पदोन्नत होकर सिविल जज (सीनियर डिवीजन) बनीं। उनके विरुद्ध वर्ष 2018 में एक गुमनाम शिकायत उच्च न्यायालय को प्राप्त हुई थी, जिसके आधार पर उनके खिलाफ जांच प्रक्रिया शुरू की गई।

2020 में हुई थी बर्खास्तगी

जांच प्रक्रिया के बाद हाईकोर्ट की फुल कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2020 को प्रस्ताव पारित कर दीपाली शर्मा को पद से हटाने का निर्णय लिया था। इसके अनुपालन में राज्य सरकार ने 20 अक्टूबर 2020 को बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया था।

जांच रिपोर्ट में नहीं पाई गईं दोषी

दीपाली शर्मा ने बर्खास्तगी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। याचिका में जांच रिपोर्ट और राज्य सरकार के आदेश को आधार बनाते हुए कहा गया कि उन्हें बिना ठोस आधार के पद से हटाया गया।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता आदित्य प्रताप सिंह ने बताया कि उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त अतिरिक्त जिला न्यायाधीश स्तर के जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में दीपाली शर्मा को दोषी नहीं पाया था। इसके बावजूद फुल कोर्ट के प्रस्ताव के आधार पर उन्हें बर्खास्त कर दिया गया।

आरोप रिकॉर्ड के विपरीत: हाईकोर्ट

खंडपीठ ने अपने फैसले में कड़े शब्दों में टिप्पणी करते हुए कहा कि दीपाली शर्मा के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप और निकाले गए निष्कर्ष रिकॉर्ड के विपरीत और गलत प्रकृति के थे। अदालत ने यह भी कहा कि इस पूरे प्रकरण में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की मंजूरी का कोई दस्तावेज रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है।

बाल श्रम के आरोप भी साबित नहीं

गुमनाम शिकायत में आरोप लगाया गया था कि दीपाली शर्मा ने अपने घर में एक 14 वर्षीय नाबालिग लड़की को घरेलू काम के लिए रखा था और उसके साथ दुर्व्यवहार किया जाता था। हालांकि जांच के दौरान नाबालिग लड़की और उसके पिता दोनों ने बाल श्रम और मारपीट के आरोपों से स्पष्ट इनकार किया।

अदालत ने यह भी कहा कि उत्तराखंड सरकारी कर्मचारी नियम, 2002 के अंतर्गत की गई विभागीय जांच में बाल श्रम से संबंधित कोई आरोप ही नहीं लगाया गया था, ऐसे में इस आधार पर कार्रवाई करना न्यायोचित नहीं था।

50 प्रतिशत वेतन सहित सभी लाभ देने के आदेश

हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि दीपाली शर्मा को बर्खास्तगी की तिथि से निरंतर सेवा में माना जाएगा। इसके साथ ही उन्हें वरिष्ठता, पद संबंधी लाभ तथा 50 प्रतिशत वेतन और अन्य सेवा लाभ प्रदान किए जाएंगे।

न्यायिक सेवा में बड़ा संदेश

इस फैसले को न्यायिक सेवा से जुड़े अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है, जिसमें अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस साक्ष्य और विधिसम्मत प्रक्रिया के किसी अधिकारी के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं की जा सकती।

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