रुद्रप्रयाग में फिर आपदा की आशंका, नदी किनारे हजारों की आबादी खतरे में

रुद्रप्रयाग – उत्तराखंड की जीवनदायिनी नदियां अब स्थानीय लोगों के लिए खतरे की वजह बनती जा रही हैं। 2013 की भीषण केदारनाथ आपदा को भले ही 12 साल बीत चुके हों, लेकिन उस तबाही के जख्म आज भी ताजे हैं। दुख की बात यह है कि उस भयावह त्रासदी से भी लोगों ने कोई सबक नहीं लिया।

मंदाकिनी और अलकनंदा नदियों के किनारे एक बार फिर बस्तियां बस चुकी हैं। रुद्रप्रयाग जिले के बेलनी क्षेत्र और मंदाकिनी घाटी में ऐसे हजारों लोग हैं, जिन्होंने अपने आशियाने ठीक नदी के किनारे बना लिए हैं। नदी के उफनते जलस्तर ने अब इन घरों को सीधा निशाना बनाना शुरू कर दिया है। बीते दिनों हुई भारी बारिश के बाद नदी का पानी कई आवासीय कॉलोनियों तक पहुंच चुका है।

फिर दोहराई जा रही है 2013 की गलती

2013 की विनाशकारी बाढ़ ने केदारनाथ से लेकर तिलवाड़ा तक के सैकड़ों घर और जनजीवन को तबाह कर दिया था। फिर भी नदियों के आसपास निर्माण कार्य थमा नहीं। अब हालात ऐसे हैं कि नदी किनारे बहु-मंजिला इमारतें तक खड़ी हो गई हैं, जो न केवल स्थानीय निवासियों के लिए खतरा बन चुकी हैं, बल्कि भविष्य में किसी बड़ी आपदा को आमंत्रण भी दे रही हैं।

खतरे के साये में जिंदगी

इन दिनों मंदाकिनी और अलकनंदा दोनों नदियों का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर पहुंच गया है। कई इलाकों में पानी सीधे घरों की दहलीज तक पहुंच चुका है। रातें अब खौफ के साए में गुजर रही हैं, लेकिन इसके बावजूद लोग अपने घर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि सरकार को स्थायी और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था करनी चाहिए, लेकिन विस्थापन स्वीकार नहीं।

प्रशासन की कोशिशें और चुनौतियां

रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी प्रतीक जैन का कहना है कि प्रशासन की ओर से लगातार सतर्कता बरती जा रही है। जल स्तर बढ़ने पर प्रभावित इलाकों में मुनादी कर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के लिए कहा जाता है। मगर बड़ी चुनौती यह है कि लोग अपने घरों से हटने को तैयार नहीं।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों का मानना है कि जिस तरह नदी किनारे अतिक्रमण और बेतरतीब निर्माण हो रहे हैं, वह किसी दिन फिर से एक बड़ी त्रासदी में बदल सकते हैं। सिर्फ चेतावनी और अस्थायी राहत से बात नहीं बनेगी, जब तक स्थायी पुनर्वास योजना और निर्माण पर सख्त नियंत्रण नहीं होगा।

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