आपदा का अलर्ट: पहाड़ से मैदान तक कहर, विकास की अंधी दौड़ बनी विनाश का कारण

देहरादून/मैदानी क्षेत्र:
मानसून का कहर अब केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राज्य के मैदानी इलाकों को भी अपनी चपेट में ले चुका है। राजधानी दून और उसके आसपास के इलाकों में बीती रात हुई भीषण बारिश और बादल फटने की घटनाओं ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया। एक ही रात में करीब डेढ़ दर्जन लोगों की मौत हो गई, जबकि करोड़ों की निजी और सरकारी संपत्तियां तबाह हो गईं।

तबाही का मंजर

  • कई पुल और सड़कें बह गए या ध्वस्त हो गए।

  • लोगों के घर, दुकानें, होटल और रेस्टोरेंट मलबे में तब्दील हो गए।

  • आईटी पार्क के पास दून–सहस्त्रधारा मार्ग का बड़ा हिस्सा बह गया।

  • ऋषि नगर का पुल ढह गया।

  • पौटा साहिब मार्ग पर प्रेमनगर के पास नदी पर बना पुल टूट गया, जिससे आवागमन पूरी तरह ठप है।

  • दिल्ली–हरिद्वार–दून हाईवे पर फनवैली के पास सौग नदी का पुल भी टूट गया, जिससे यातायात डाइवर्ट करना पड़ा।

राहत और बचाव कार्य

विकासनगर में नदी में बहे लोगों की तलाश जारी है, वहीं सहस्त्रधारा क्षेत्र में मलबे में दबे लोगों को निकालने के लिए बचाव टीमें दिन-रात जुटी हुई हैं। व्यवसायियों के होटल और दुकानों को भी भारी नुकसान हुआ है।

पर्यटक संकट में

मसूरी में लगभग 3,000 पर्यटक फंसे हुए हैं क्योंकि दून वापसी का मार्ग बंद हो गया है। राहत की बात यह है कि होटल एसोसिएशन और स्थानीय लोग दरियादिली दिखाकर इन पर्यटकों की मदद कर रहे हैं।

केंद्र से मदद, लेकिन जख्म गहरे

धराली, थराली और बागेश्वर में पहले आई आपदाओं के लिए केंद्र सरकार मदद दे रही है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी मदद से वास्तविक नुकसान की भरपाई संभव नहीं।

विकास या विनाश?

विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि राज्य में हो रहा अनियोजित विकास और लगातार बढ़ती आबादी के दबाव ने नदियों और खालों के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र को बाधित कर दिया है। यही अतिक्रमण आपदा को और भयावह बना रहा है।

हर बार आपदा आने के बाद खूब चर्चा होती है, योजनाएं बनती हैं, लेकिन कुछ दिनों में सब भुला दिया जाता है। यह लापरवाही आने वाले समय में न केवल उत्तराखंड बल्कि हिमाचल और कश्मीर जैसे हिमालयी राज्यों को और भी बड़ी त्रासदी के मुहाने पर खड़ा कर सकती है।

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