सिलेंडर पर संग्राम

रसोई गैस का मुद्दा सीधे आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी और पेट की भूख से जुड़ा हुआ है। इसलिए इस विषय को लेकर लोगों की चिंता स्वाभाविक है। हम बचपन से यह कहावत सुनते आए हैं—“भूखे भजन न होय गोपाला”। जब रसोई का चूल्हा ही न जले तो बाकी सारी बातें बेमानी लगने लगती हैं।

हाल के दिनों में वैश्विक स्तर पर पैदा हुए हालात ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। इज़रायल, ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव और तेल-गैस आपूर्ति से जुड़े अहम मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट की खबरों ने पूरी दुनिया में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर आशंकाएं पैदा कर दी हैं। ऐसे माहौल में जब केंद्र सरकार राज्यों को यह निर्देश देती है कि गैस की कमी की अफवाह फैलाने वालों पर कार्रवाई की जाए, तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में सवाल उठने लगते हैं।

सरकार का दावा है कि देश में गैस या तेल की कोई कमी नहीं है। लेकिन दूसरी ओर उपभोक्ताओं को 25 दिन बाद ही अगला सिलेंडर बुक करने की सलाह दी जा रही है। कई जगहों पर गैस बुकिंग में तकनीकी दिक्कतों का हवाला दिया जा रहा है और लोगों को बार-बार प्रयास करने के बाद भी बुकिंग नंबर नहीं मिल पा रहे हैं। ऐसे में आम आदमी के मन में असमंजस की स्थिति बनना लाज़मी है।

अगर वास्तव में गैस की कोई कमी नहीं है तो फिर देश के अलग-अलग शहरों से होटल, ढाबों, रेस्टोरेंट और स्ट्रीट फूड कारोबारियों के बंद होने की खबरें क्यों आ रही हैं? कई कारोबारी यह कह रहे हैं कि उन्हें समय पर सिलेंडर नहीं मिल पा रहा है और बाजार में ब्लैक में भी सिलेंडर मिलना मुश्किल हो गया है। दूसरी तरफ कुछ स्थानों पर लोग रात के अंधेरे में ही गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारों में खड़े दिखाई दे रहे हैं।

केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी का कहना है कि यह एक तरह का “पैनिक क्राइसिस” है, जिसमें अफवाहों के कारण लोग जरूरत से ज्यादा गैस बुक कर रहे हैं। वहीं पेट्रोलियम मंत्रालय की सचिव सुजाता सौनिक का दावा है कि देश में 25 हजार से अधिक गैस वितरक हैं और कहीं से भी गैस की वास्तविक कमी की शिकायत नहीं मिली है। सरकार का यह भी कहना है कि कुछ लोग कृत्रिम संकट पैदा कर गैस की जमाखोरी और ब्लैक मार्केटिंग की कोशिश कर रहे हैं।

लेकिन सवाल यही है कि अगर सब कुछ सामान्य है तो फिर बाजार में यह बेचैनी क्यों दिखाई दे रही है? आखिर क्यों आम उपभोक्ता और छोटे कारोबारी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं?

यह सच है कि यदि अंतरराष्ट्रीय हालात लंबे समय तक तनावपूर्ण बने रहते हैं तो ऊर्जा आपूर्ति पर उसका असर पड़ सकता है। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पारदर्शिता के साथ स्थिति स्पष्ट करे और वितरण व्यवस्था को इतना मजबूत बनाए कि आम लोगों को किसी तरह की परेशानी न हो।

रसोई गैस केवल एक ईंधन नहीं, बल्कि हर घर की जरूरत है। इसलिए जरूरी है कि इस मुद्दे पर न तो अफवाहें फैलें और न ही आम आदमी को असमंजस की स्थिति में छोड़ा जाए। क्योंकि जब चूल्हा जलता है तभी घर में सुकून और समाज में संतुलन बना रहता है।

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