“अमीरों को राहत, आम जनता पर बोझ” बजट 2026 पर भाकपा माले का तीखा हमला, डॉ. कैलाश पांडे ने उठाए बड़े सवाल

नैनीताल: केंद्रीय बजट 2026 को लेकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के नैनीताल जिला सचिव डॉ. कैलाश पांडे ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने बजट को अमीर-परस्त और जनविरोधी बताते हुए कहा कि यह पिछले एक दशक से चली आ रही उसी आर्थिक नीति को आगे बढ़ाता है, जिसमें आर्थिक वृद्धि तो दिखाई जाती है, लेकिन सामाजिक न्याय और समानता को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

“कॉरपोरेट टैक्स घटा, रोजगार नहीं बढ़ा”

डॉ. कैलाश पांडे ने कहा कि बीते वर्षों में कॉरपोरेट टैक्स की दरों में भारी कटौती की गई, लेकिन इसके बावजूद न तो निजी निवेश अपेक्षित स्तर तक बढ़ा और न ही रोजगार सृजन हुआ।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब टैक्स छूट का लाभ आम लोगों तक नहीं पहुंचा, तो फिर बजट 2026 में एक बार फिर बड़े कॉरपोरेट घरानों को रियायतें क्यों दी जा रही हैं?

उनका कहना है कि वेतन वृद्धि ठहरी हुई है और बेरोजगारी, खासकर युवाओं के बीच, एक गंभीर सामाजिक संकट का रूप ले चुकी है, जिस पर बजट में कोई ठोस समाधान नजर नहीं आता।

 शिक्षा और स्वास्थ्य में अपर्याप्त खर्च

भाकपा माले नेता ने सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर भी बजट पर सवाल खड़े किए।
उन्होंने कहा कि:

  • भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय आज भी दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बेहद कम है।

  • करोड़ों लोग इलाज के लिए अपनी जेब से खर्च करने को मजबूर हैं।

  • सरकारी स्कूलों और उच्च शिक्षा के लिए बजटीय आवंटन, बढ़ती लागत और नामांकन के अनुरूप नहीं है।

डॉ. पांडे के अनुसार, यह स्थिति सामाजिक असमानता को और गहरा कर रही है।

 किसानों के लिए “खोखले वादे”

कृषि क्षेत्र को लेकर उन्होंने कहा कि देश की लगभग आधी कार्यबल आबादी इस क्षेत्र पर निर्भर है, लेकिन बजट 2026 में किसानों की आय सुरक्षा के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किया गया।
उन्होंने विशेष रूप से इन बिंदुओं को रेखांकित किया:

  • न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कोई कानूनी गारंटी नहीं

  • बढ़ती कृषि लागत से निपटने के लिए कोई निर्णायक हस्तक्षेप नहीं

  • छोटे और सीमांत किसानों को कॉरपोरेट वर्चस्व से बचाने की कोई नीति नहीं

संपत्ति का संकेंद्रण, टैक्स का बोझ जनता पर

डॉ. कैलाश पांडे ने कहा कि देश में संपत्ति का संकेंद्रण तेज़ी से बढ़ रहा है और राष्ट्रीय संपत्ति का बड़ा हिस्सा कुछ गिने-चुने कॉरपोरेट समूहों के हाथों में सिमटता जा रहा है।
वहीं दूसरी ओर, GST जैसे अप्रत्यक्ष करों का बोझ मेहनतकश गरीबों और मध्य वर्ग पर असमान रूप से डाला जा रहा है, जिससे उनकी क्रय शक्ति लगातार कमजोर हो रही है।

 “नवउदारवादी बजट, जनकल्याण से दूरी”

उन्होंने कहा कि कुल मिलाकर केंद्रीय बजट 2026 एक नवउदारवादी दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसमें बढ़ती असमानता को विकास का “साइड इफेक्ट” मान लिया गया है।
यह बजट गरीबी को खत्म करने के बजाय केवल उसे “प्रबंधित” करने की नीति अपनाता है और जनकल्याण की जगह कॉरपोरेट मुनाफे को प्राथमिकता देता है।

 क्या होना चाहिए प्राथमिकता?

डॉ. कैलाश पांडे ने कहा कि देश को आज एक जन-केंद्रित बजट की सख्त जरूरत है, जिसमें—

  • बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन

  • सम्मानजनक मजदूरी

  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाएं

  • गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा

  • विस्तारित खाद्य सुरक्षा

  • संपत्ति और मुनाफे पर प्रगतिशील कर व्यवस्था

को केंद्र में रखा जाए।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस बुनियादी बदलाव की दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो आर्थिक विकास कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित रह जाएगा, बड़ी आबादी गरीबी में जीने को मजबूर होगी और अंततः इससे लोकतंत्र भी कमजोर होता जाएगा

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