“जौनसार-बावर में बूढ़ी दीपावली की रौनक: मशालों की रोशनी, ढोल-दमाऊ की थाप और लोकनृत्यों से गूंजे गांव”

देहरादून जिले के जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर में पारंपरिक बूढ़ी दीपावली का उत्सव पूरे उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। जहां देशभर में दीपावली चकाचौंध और आतिशबाजी के साथ मनाई जाती है, वहीं जौनसार-बावर के ग्रामीण प्रकृति के बीच इको-फ्रेंडली दीपोत्सव मनाते हुए सदियों पुरानी इस परंपरा को आज भी संजोए हुए हैं। गांवों के पंचायती आंगन ढोल-दमाऊ की थाप, हारूल गीतों और सामूहिक नृत्यों से गुलजार हैं। लोग हाथों में होले (मशालें) लेकर पर्व की शुरुआत करते हैं और ईष्ट देवता को स्मरण कर एकजुटता और सामुदायिक भावना का संदेश देते हैं।

भीमल की टहनियों से बनती हैं ‘होले’ मशालें

बूढ़ी दीपावली की सुबह ग्रामीण कामकाज छोड़कर सामूहिक रूप से तैयारियों में जुट जाते हैं।

  • पहाड़ों में पाई जाने वाली भीमल की पतली लकड़ी से पारंपरिक तरीके से ‘होले’ यानी मशालें बनाई जाती हैं।

  • फिर सभी ग्रामीण पंचायती आंगन में एकत्र होकर वाद्ययंत्रों की ताल पर दीपावली के लोकगीत गाते हैं।

  • मशालों को प्रज्वलित कर वे ईष्ट देवता से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

इसके साथ ही जौनसार-बावर की सांस्कृतिक पहचान—हारूल गीत और नृत्य—का रंग बिखरने लगता है, जिसमें महिलाएं, पुरुष और युवा समूह एक साथ थिरकते हैं।

पांच दिनों तक चलता है उत्सव

बूढ़ी दीपावली का जश्न महज एक दिन का नहीं, बल्कि पांच दिनों तक चलने वाला सामूहिक पर्व है। इस दौरान गांवों में हर शाम पंचायती आंगन लोकगीतों, नृत्यों और सामूहिक मिलन से जीवंत रहता है।

उत्सव में अखरोट और चिवड़ा का विशेष महत्व

परंपरा के अनुसार—

  • सबसे पहले अखरोट और चिवड़ा ईष्ट देवता को अर्पित किए जाते हैं।

  • उसके बाद इन्हें प्रसाद के रूप में पूरे समुदाय में वितरित किया जाता है।

ये दोनों चीजें पर्व की पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं।


देशभर में दीपावली—कुछ खत पट्टियों में बूढ़ी दीपावली

जौनसार-बावर में यह उत्सव कब मनाया जाए, इसके पीछे स्थानीय मान्यताओं का बड़ा आधार है। लोक-विश्वास है कि जिस खत पट्टी में चालदा महासू देवता प्रवास पर रहते हैं, वहां दीपावली देशभर के साथ पारंपरिक तरीके से मनाई जाती है। लेकिन जिन खत पट्टियों में महासू देवता उपस्थित रहते हैं, वहां एक महीना बाद बूढ़ी दीपावली का पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष भी दसऊ, पशगांव और आसपास की खत पट्टियों में बूढ़ी दीपावली की धूम देखने को मिल रही है।

एक महीने बाद पर्व मनाने के पीछे लोककथाएँ

बूढ़ी दीपावली क्यों एक महीने बाद मनाई जाती है—इस पर कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं:

  1. महासू देवता से जुड़ी मान्यता
    स्थानीय लोग इसे अपने आस्थागत देवता महासू देवता से जोड़ते हैं। माना जाता है कि दीपावली उन्हीं के संकेत और परंपरा के अनुसार मनाई जाती है।

  2. कामकाज के फुर्सत के दिनों में पर्व
    पहाड़ी क्षेत्र के लोग बताते हैं कि इस समय कृषि कार्यों से कुछ राहत मिलती है, जिससे सामूहिक उत्सव मनाने का मौका मिलता है।

  3. रामायण से जुड़ी कहानी
    एक लोककथा के अनुसार, जब भगवान राम वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटे, तो इसकी खबर दूरदराज के पहाड़ों में रहने वाले जौनसारी लोगों को एक महीने बाद मिली। तब उन्होंने खुशी में दीपावली मनाई, और उसी परंपरा को आगे बढ़ाया गया।

पूरे क्षेत्र में उत्सव का जोश

जौनसार-बावर में बूढ़ी दीपावली एक त्योहार से बढ़कर सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। नौकरी–पेशा युवा भी इस समय अपने पैतृक गांव लौटते हैं ताकि इस लोक पर्व का हिस्सा बन सकें। बूढ़ी दीपावली की यही विशिष्टता इसे आधुनिकता में भी जीवंत और आकर्षक बनाए रखती है।

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