देहरादून। राजधानी देहरादून का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल “दून हॉस्पिटल” एक बार फिर सरकारी लापरवाही और सिस्टम की नाकामी का प्रतीक बन गया है। जिस न्यूमेटिक सिस्टम पर दो करोड़ रुपये से अधिक की जनता की गाढ़ी कमाई खर्च की गई थी, वह पिछले कई महीनों से ठप पड़ा है। इस अत्याधुनिक सिस्टम को अस्पताल में रक्त जांच, सैंपल और रिपोर्ट्स को विभिन्न विभागों तक तेज़ी से पहुंचाने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था, ताकि मरीजों को सुविधा मिले और समय की बचत हो सके। लेकिन आज यह सिस्टम धूल फांक रहा है और अस्पताल प्रशासन की उदासीनता का शिकार हो गया है।
स्थिति यह है कि ऑपरेशन थिएटर से लेकर ब्लड बैंक और पैथोलॉजी विभाग तक सभी इस सिस्टम की खराबी से परेशान हैं। जहां यह तकनीक कुछ मिनटों में सैंपल पहुंचाने में सक्षम थी, वहीं अब कर्मचारियों को मैन्युअल रूप से सैंपल ले जाने पड़ रहे हैं। इसके कारण जांच रिपोर्ट मिलने में घंटों लग रहे हैं और कई बार सर्जरी तक टालनी पड़ रही है। गंभीर मरीजों को राहत मिलने के बजाय तकलीफें बढ़ गई हैं।
अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी इस पूरे मामले पर और भी सवाल खड़े करती है। जिस योजना को मरीजों की सुविधा के लिए लागू किया गया था, वही अब परेशानी का कारण बन गई है। अस्पताल में रोजाना सैकड़ों मरीज जांच और रिपोर्ट के इंतजार में कतारों में खड़े रहते हैं, जबकि अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर मामले को टाल रहे हैं।
यह वही राज्य सरकार है जो हर मंच से डिजिटल उत्तराखंड और स्मार्ट हेल्थ सिस्टम की बातें करती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। करोड़ों रुपये खर्च करके लगाया गया सिस्टम अब खामोश पड़ा है और कोई नहीं जानता कि इसे कब चालू किया जाएगा। अस्पताल के कई कर्मचारी बताते हैं कि सिस्टम की मरम्मत के लिए कई बार पत्राचार किया गया, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
जनता के बीच यह सवाल उठ रहा है कि आखिर यह पैसा गया कहाँ? जब करोड़ों रुपये खर्च किए गए और फिर भी सिस्टम न चल पाए, तो जवाबदेही किसकी है? क्या यह जनता के पैसों की खुली लूट नहीं है? सरकार और स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिकता जनता की सुविधा होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा लगता है कि ठेकेदारों और अधिकारियों के बीच मिलीभगत से यह परियोजना केवल फाइलों तक सीमित रह गई।
अस्पताल के सर्जरी, मेडिसिन और पीडिया विभागों में रोजाना भारी भीड़ उमड़ती है। रिपोर्ट में देरी के कारण मरीजों की स्थिति गंभीर होती जा रही है। जिन मरीजों को तत्काल ऑपरेशन या ब्लड रिपोर्ट की जरूरत होती है, उन्हें घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। कई बार मरीजों को निजी लैब में रिपोर्ट कराने के लिए भेजा जाता है, जिससे गरीबों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है।
दून अस्पताल में न्यूमेटिक सिस्टम की यह नाकामी केवल एक तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की विफलता का सबूत है। यह उस सोच पर भी सवाल खड़ा करती है जिसमें सरकार विकास और डिजिटल क्रांति के बड़े दावे करती है, लेकिन ज़मीन पर सुविधाओं की हालत बदतर होती जा रही है। जनता यह जानना चाहती है कि आखिर इस लापरवाही का जिम्मेदार कौन है? कब तक सरकारी अस्पतालों में मरीजों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ होता रहेगा और कब सरकार जागेगी?
दून अस्पताल का यह उदाहरण इस बात का संकेत है कि राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार के दावे केवल कागजों पर हैं। जब राजधानी का सबसे बड़ा अस्पताल ही अव्यवस्था का शिकार है, तो बाकी जिलों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। जनता उम्मीद कर रही है कि सरकार इस पर गंभीरता से कार्रवाई करेगी और दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाएगी, वरना “स्मार्ट हेल्थ सिस्टम” का नारा महज़ एक खोखला वादा बनकर रह जाएगा।
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