“कागज़ों में डॉक्टर पूरे, अस्पतालों में खाली कुर्सियाँ: उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल, 1039 में से 432 पद रिक्त”

उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में डॉक्टरों के सृजित 1039 पदों के सापेक्ष 432 रिक्त हैं। कई सीएचसी और पीएचसी डॉक्टरविहीन हैं। पढ़िए पिथौरागढ़, चंपावत, अल्मोड़ा, बागेश्वर, नैनीताल और ऊधमसिंह नगर से संवाद न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट

देहरादून। उत्तराखंड सरकार एक ओर स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। कुमाऊं मंडल के अस्पतालों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। यहां डॉक्टरों के कुल 1039 स्वीकृत पदों में से 432 रिक्त हैं। कई सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) पूरी तरह से डॉक्टरविहीन हैं।

प्रदेश की जनता लंबे समय से डॉक्टरों की कमी से त्रस्त है, खासकर पहाड़ी जिलों में हालात ज्यादा गंभीर हैं। जिन संविदा चिकित्सकों के भरोसे पहाड़ की जनता को कुछ राहत मिलती थी, उनके संविदा विस्तार से भी सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं। हाईकोर्ट में सरकार दावा करती है कि प्रदेश में डॉक्टरों की कमी नहीं है, लेकिन अस्पतालों का सन्नाटा और मरीजों की बढ़ती परेशानी कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।

अल्मोड़ा: बाल रोग विशेषज्ञ तक नहीं

अल्मोड़ा जिले की नौ सीएचसी में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 47 पद खाली हैं। किसी भी केंद्र में महिला और बाल रोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं हैं। भिकियासैंण सीएचसी पूरी तरह संविदा चिकित्सक के भरोसे चल रही है। सीएमओ डॉ. नवीन तिवारी का कहना है कि सुविधाएं मुहैया कराने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन हकीकत यह है कि बाल रोग विशेषज्ञ के अभाव में बच्चों का इलाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

बागेश्वर: नौ पीएचसी पूरी तरह डॉक्टरविहीन

बागेश्वर में डॉक्टरों के 107 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 31 रिक्त हैं। जिले में एक जिला अस्पताल, तीन सीएचसी और 29 पीएचसी हैं। जिला अस्पताल में 30 में से सात पद खाली हैं। वहीं नौ पीएचसी ऐसे हैं, जहां एक भी चिकित्सक नहीं है। कांडा, कपकोट और बैजनाथ की सीएचसी में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है।

नैनीताल: बीडी पांडे में भी डॉक्टरों की कमी

नैनीताल जिले में 340 पदों के सापेक्ष 87 पद रिक्त हैं। बीडी पांडे अस्पताल में ही 14 पद खाली हैं, जिनमें दो बाल रोग विशेषज्ञ भी शामिल हैं। पीएमएस डॉ. टीके टम्टा ने बताया कि डॉक्टरों की कमी को पूरा करने की कोशिशें की जा रही हैं, लेकिन तत्काल राहत मिलती नहीं दिख रही।

पिथौरागढ़: महिला आबादी दो विशेषज्ञों पर निर्भर

पिथौरागढ़ जिले के 60 से अधिक अस्पतालों में 174 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 85 खाली पड़े हैं। 12 डॉक्टर पीजी करने चले गए हैं और 10 लंबे समय से गैरहाजिर हैं। जिले की महिला आबादी के इलाज के लिए केवल दो महिला रोग विशेषज्ञ ही उपलब्ध हैं। इससे महिला स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं।

चंपावत: 50% पद खाली

चंपावत जिले में डॉक्टरों की कमी आधे से ज्यादा है। यहां 111 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 60 डॉक्टर ही कार्यरत हैं। शेष 51 पद खाली हैं। जिला अस्पताल में 36 पदों में से 11 रिक्त हैं, जबकि उपजिला अस्पताल लोहाघाट में 21 में से 10 पद खाली हैं।

ऊधमसिंह नगर: आईसीयू अधर में

ऊधमसिंह नगर जिले में डॉक्टरों के 226 पद स्वीकृत हैं, लेकिन 131 खाली हैं। जिला अस्पताल के आईसीयू समेत कई महत्वपूर्ण इकाइयां बिना डॉक्टर के अधर में हैं। यहां 33 पीएचसी में से 18 ऐसे हैं, जहां एक भी चिकित्साधिकारी मौजूद नहीं है।

प्रदेश में सरकार के दावे और जमीनी हालात पूरी तरह अलग तस्वीर पेश कर रहे हैं। एक ओर सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार और डॉक्टरों की नियुक्तियों की बातें करती है, वहीं दूसरी ओर अस्पतालों की हालत दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है। डॉक्टरों की भारी कमी के चलते पहाड़ों के मरीज इलाज के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि अगर सरकार के अनुसार डॉक्टरों की कमी नहीं है, तो फिर मरीजों को अस्पतालों में इलाज क्यों नहीं मिल पा रहा?

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