विकसित भारत@2047” की ओर बढ़ता उत्तराखंड: अंतरिक्ष सम्मेलन में मुख्यमंत्री धामी का संबोधन, इसरो प्रमुख की मौजूदगी

देहरादून, 30 जून 2025 — उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित मुख्यमंत्री आवास के मुख्य सेवक सदन में आज “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए हिमालयी राज्यों की भूमिका पर केंद्रित अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी एवं अनुप्रयोग पर एक उच्चस्तरीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक अवसर पर मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रतिभाग किया, वहीं भारत के अंतरिक्ष मिशनों का नेतृत्व कर रहे इसरो अध्यक्ष डॉ. वी. नारायणन बतौर विशेष अतिथि सम्मेलन में उपस्थित रहे।


अंतरिक्ष सम्मेलन: उत्तराखंड के लिए नई संभावनाओं का द्वार

मुख्यमंत्री ने देश-विदेश से आए वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और तकनीकी विशेषज्ञों का स्वागत करते हुए कहा कि यह सम्मेलन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की परिकल्पना “विकसित भारत@2047” को मूर्त रूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष विज्ञान अब केवल अनुसंधान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि संचार, कृषि, मौसम विज्ञान, आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य, शिक्षा और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में इसकी उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है।

मुख्यमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे वैज्ञानिक श्री शुभांशु शुक्ला को बधाई दी, जिन्होंने वहाँ तिरंगा फहराकर देश का गौरव बढ़ाया। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि गगनयान मिशन और भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए एक मजबूत नींव रखेगी।


चंपावत मॉडल जिला और विज्ञान नवाचार पर फोकस

इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने चंपावत को एक मॉडल जिला के रूप में विकसित करने के लिए इसरो और यूकॉस्ट द्वारा तैयार किए गए विशेष डैशबोर्ड का शुभारंभ किया। इसके साथ ही उन्होंने इसरो द्वारा प्रकाशित पुस्तक का भी विमोचन किया। मुख्यमंत्री ने जानकारी दी कि राज्य सरकार साइंस सिटी, नवाचार केंद्र, AI, रोबोटिक्स, ड्रोन लैब्स जैसे अत्याधुनिक शोध एवं विकास केंद्रों की स्थापना पर तेजी से कार्य कर रही है।

उन्होंने कहा, “उत्तराखंड को ‘स्पेस टेक्नोलॉजी फ्रेंडली स्टेट’ बनाना हमारा लक्ष्य है। यह सम्मेलन निश्चित रूप से हमारे राज्य के सतत विकास में सहयोगी सिद्ध होगा।”


ISRO अध्यक्ष का प्रेरणादायक संबोधन

इसरो अध्यक्ष डॉ. वी. नारायणन ने भारत के अंतरिक्ष इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 1963 में जब भारत ने अपना पहला रॉकेट लॉन्च किया था, तब कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि एक दिन हम चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचेंगे। उन्होंने कहा:

  • भारत के पास अब 131 उपग्रह हैं, जो कृषि, संचार, शिक्षा सहित कई क्षेत्रों में सहायता कर रहे हैं।

  • 75 हजार किलोग्राम तक वजन वाले सैटेलाइट को पृथ्वी की लोअर ऑर्बिट में ले जाने में सक्षम रॉकेट पर कार्य चल रहा है।

  • भारत पहला देश है जिसने चंद्रमा के साउथ पोल पर लैंडिंग की।

  • भारत ने आदित्य एल-1 मिशन के साथ सूर्य का अध्ययन प्रारंभ किया है।

  • 2030 तक भारतीय स्पेस स्टेशन और 2040 तक चंद्रमा पर मानव मिशन की योजना पर कार्य हो रहा है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने अंतरिक्ष में भी वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को आगे बढ़ाया है।


अंतरिक्ष तकनीक: आपदा प्रबंधन से लेकर पशुधन संरक्षण तक

राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) के निदेशक डॉ. प्रकाश चौहान ने बताया कि कैसे उपग्रह डाटा उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है:

  • ऋषिगंगा चमोली आपदा के समय रियल-टाइम सैटेलाइट मैपिंग से नीति निर्धारण में मदद मिली।

  • पशुधन डेटाबेस को ऑनलाइन किया गया।

  • ग्लेशियर मॉनिटरिंग, वनाग्नि, बाढ़, बादल फटना जैसी आपदाओं की पूर्व चेतावनी में सेटेलाइट डाटा कारगर सिद्ध हो रहा है।


राज्य की अपेक्षाएं और सहयोग की दिशा

मुख्य सचिव श्री आनंद बर्द्धन ने राज्य की आवश्यकताओं का उल्लेख करते हुए इसरो से आग्रह किया कि वह उत्तराखंड के साइंस सेंटर्स को गोद लें और 50 सेमी रिजोल्यूशन वाले सेटेलाइट इमेजेज को नॉन-कमर्शियल उपयोग हेतु रीयल टाइम में राज्य सरकार को उपलब्ध कराएं। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष तकनीक को स्थानीय जरूरतों से जोड़ने के लिए एक स्थायी वैज्ञानिक ढांचा तैयार किया जा रहा है।


उच्चस्तरीय भागीदारी

इस सम्मेलन में प्रमुख सचिव आर.के. सुधांशु, आर. मीनाक्षी सुंदरम, सचिव शैलेश बगोली, नितेश झा, यूकॉस्ट महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत, वैज्ञानिक एवं अन्य अधिकारी उपस्थित रहे। सम्मेलन में उत्तराखंड के पर्वतीय भूगोल को ध्यान में रखते हुए अंतरिक्ष तकनीक के उपयोग पर गहन विचार-विमर्श हुआ।

यह अंतरिक्ष सम्मेलन न केवल उत्तराखंड बल्कि समस्त हिमालयी राज्यों के लिए एक दिशा-सूचक है, जो यह दर्शाता है कि कैसे उन्नत अंतरिक्ष तकनीक पर्वतीय क्षेत्रों में विकास, आपदा प्रबंधन, और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में अहम भूमिका निभा सकती है। उत्तराखंड अब इसरो के सहयोग से “विकसित भारत 2047” के सपने को साकार करने की दिशा में अपने कदम तेज़ी से बढ़ा रहा है।

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