गोरखपुर के पात्रों से समृद्ध् हुआ मुंशी प्रेमचंद का कथा संसार, गोरखपुर में तैनात था ‘नमक का दारोगा’

कथा सम्राट प्रेमचंद पर जितना अधिकार बनारस का है, उतना ही गोरखपुर का भी। ऐसा इसलिए कि दो चरणो में अपनी गोरखपुर रिहाइश के दौरान वह यहां पढ़े भी और पढ़ाए भी। अगर यह कहा जाए कि साल 1892 से चार वर्ष के पहले प्रवास के दौरान ही इस महान कथाकार के कथा साहित्य की नींव पड़ी तो गलत नहीं होगा। इसका पुख्ता प्रमाण मुंशी जी की पहली कहानी ‘मेरी पहली रचना’ है, जिसे उन्होंने अपने मामा के चरित्र को ध्यान में रखकर यहीं लिखी।

शिक्षा विभाग में नौकरी के दौरान दूसरे चरण में गोरखपुर प्रवास के लिए जब 1916 में वह तबादला होकर गोरखपुर आए तो महज पांच साल की रिहाइश में उन्होंने गोरखपुर की धरती से दमदार पात्र तलाश कर ऐसी कृतियां गढ़ दीं, जो साहित्य जगत में आज भी मील का पत्थर हैं। कथा सम्राट को ‘ईदगाह’ का हामिद अगर गोरखपुर में ईदगाह के मेले से मिला तो नमक का दारोगा वंशीधर भी इसी धरती की खोज थे। ‘बूढ़ी काकी’ से लेकर ‘दो बैलों की कथा’ की पृष्ठभूमि और उसके पात्र भी गोरखपुर की ही देन हैं।

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